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    वर्ल्ड वाइड वेब से AI तक, इंटरनेट ने कैसे बदल दिए जीने और काम करने के तरीके

    Updated: Wed, 29 Jul 2026 10:30 AM (IST)

    दुनियाभर में 5.5 अरब से अधिक लोग इंटरनेट का प्रयोग कुछ नया सीखने, संदेश भेजने, लोगों से जुड़ने, ई-कामर्स, रिमोट वर्क जैसे बेशुमार कार्यों के लिए कर रह ...और पढ़ें

    वर्ल्ड वाइड वेब से AI तक, इंटरनेट ने बदल दिए जीने और काम करने के तरीके

    वर्ल्ड वाइड वेब से AI तक, इंटरनेट ने बदल दिए जीने और काम करने के तरीके

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    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

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    ब्रह्मानंद मिश्रा, नई दिल्ली। कल्पना कीजिए एक सुबह आपको पता चले कि ईमेल, वाट्सएप मैसेजिंग, कालिंग, ब्राउजिंग, इंटरनेट मीडिया सब बंद हो गए हैं, सोचिए जिंदगी कितनी मुश्किल हो जाएगी। कुछ ही दशक पहले लोग इन सभी सुविधाओं से अनजान थे। वायरल वीडियो, रील्स, मीम्स और स्क्रालिंग से किसी का कुछ भी लेना देना नहीं था।

    दरअसल, ऐसी चमत्कारिक घटनाओं की नींव पड़ी करीब साढ़े तीन दशक पहले, जब दुनिया पहली बार वर्ल्ड वाइड वेब (www) से परिचित हो रही थी। आज हम उस मुकाम पर हैं, जहां गैजेट्स आपके सोने-जागने के मुताबिक अलार्म सेट कर रहे हैं, स्मार्टवाच हार्टअटैक के संकेत बता कर लोगों की जान बचा रही हैं। कुछ वर्षों पहले तक यह साइंस फिक्शन जैसा ही था। आज इंटरनेट आफ थिंग्स (आइओटी) हमारे वास्तविक जीवन का तेजी से डिजिटलीकरण कर रहा है।

    इंटरनेट सामान्य कम्युनिकेशन नेटवर्क से आगे बढ़कर आधुनिक जीवन की रीढ़ बन चुका है। यह हमारे सीखने, काम करने, खरीदारी, यात्रा, कम्युनिकेशन और स्वास्थ्य देखभाल के तरीकों को हर रोज बदल रहा है। जिस तरह इंटरनेट ने अरबों लोगों और डिवाइसेज को परस्पर जोड़ा है, उससे निस्संदेह यह मानव इतिहास की उल्लेखनीय उपलब्धि के तौर पर दर्ज हो चुका है।

    बदलती गई इंटरनेट की दुनिया

    20वीं शताब्दी के नौंवे दशक में सर्न (यूरोपीयन काउंसिल फार न्यूक्लियर रिसोर्स) के एक कमरे में जब टिम बर्नर्स ली वर्ल्ड वाइड वेब का कोड लिख रहे थे, शायद उन्हें भी यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि इस काम से वे आधुनिक जीवन के इतिहास को एक नया मोड़ भी देने जा रहे हैं। वर्ल्ड वाइड वेब के रूप में इसकी पहचान बनने से पहले ली ने इसे 'मेश' नाम दिया था।

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    शुरुआती दिनों में वेब पर तस्वीरें लाइन-बाइ-लाइन लोड होती थीं। कई बार यह प्रक्रिया इतनी स्लो होती थी कि आप अपना लंच निपटा दें, लेकिन आज 1.1 अरब से अधिक वेबसाइट हैं। इसी तरह, वेब ब्राउजर्स का सफर भी कम रोचक नहीं है, मोजैक पहला ब्राउजर था, फिर नेटस्केप नेविगेटर और इंटरनेट एक्सप्लोरर से यह सफर क्रोम, फायरफाक्स, एज जैसे माडर्न ब्राउजर्स तक पहुंचा।

    एक समय वेबसाइट की डिजाइन सीधी-सपाट होती थी, वही अब रियल टाइम में म्यूजिक, गेम की स्ट्रीमिंग कर रही हैं, यहां तक कि आप वेब पर एआइ से बातचीत भी कर सकते हैं।

    बन गया सबके लिए उपयोगी

    स्मार्टफोन के जरिये आज इंटरनेट सर्विसेज हर समय उपलब्ध हैं। हजारों मील दूर बैठे परिवार वीडियो काल पर बात कर लेते हैं, तो वहीं छात्र आनलाइन माध्यमों से अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे हैं। कारोबारी दुनिया अलग-अलग टाइमजोन में इसी के जरिये आपरेट हो रही है। किसी गांव में एक छोटा व्यावसायी भी अपने उत्पादों को ई-कामर्स के जरिये दुनियाभर में बेच सकता है।

    ग्राहक कीमतों की तुलना और उत्पादों की समीक्षा कर सकते हैं, कुछ मिनट में कहीं से भी खरीदारी कर सकते हैं। रिमोट वर्क आम होता जा रहा है। डिजिटल पेमेंट, आनलाइन बैंकिंग वित्तीय लेन-देन को तीव्र, सुरक्षित और सुविधाजनक बना रही है।

    इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म ग्लोबल कम्युनिटी बना रहे हैं, जहां लोग विचारों, संस्कति, क्रिएटिविटी को साझा कर रहे हैं। कंटेंट क्रिएटर्स, एजुकेटर्स, म्यूजिशियन लाखों लोगों के बीच में अपनी आसानी से पहचान बना रहे हैं, यह सब इंटरनेट के समृद्ध होने का नतीजा है।

    स्मार्ट हुई जिंदगी

    इंटरनेट की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक है 'इंटरनेट आफ थिंग्स'। यह इंटरनेट के जरिये मशीनों के परस्पर जुड़ाव की सुविधा देती है। आइओटी डिवाइसेज सेंसर, साफ्टवेयर और कम्युनिकेशन सिस्टम के जरिये आपस में जुड़ते हैं। इंसानी निर्देशों का इंतजार करने के बजाय ये रियल-टाइम डाटा के आधार पर फैसले लेती हैं। आज दुनिया भर में अरबों आइओटी डिवाइसेज चुपचाप लोगों की जिंदगी को अधिक सुरक्षित, स्मार्ट और बेहतर बना रही हैं।

    स्मार्ट होम : आप कमरे से बाहर निकलें, तो लाइटें अपने आप बंद हो जाती हैं। थर्मोस्टेट मौसम के हिसाब से तापमान एडजस्ट करता है और सिक्योरिटी कैमरा घर के मालिकों को तुरंत अलर्ट भेजते हैं।

    अस्पताल : ऐसे वियरेबल डिवाइस का इस्तेमाल हो रहा है, जो मरीजों के हार्ट रेट, ब्लड प्रेशर, आक्सीजन लेवल और नींद के पैटर्न पर लगातार नजर रखते हैं। डाक्टरों को रियल-टाइम जानकारी मिलती है और वे इमरजेंसी के समय त्वरित कार्रवाई कर सकते हैं।

    एग्रीकल्चर : स्मार्ट खेती का दायरा अभी सीमित है, पर उम्मीदें बहुत बड़ी हैं। किसान पानी की बचत करते हुए फसल का उत्पादन बढ़ाने के लिए मिट्टी में नमी मापने वाले सेंसर, मौसम की निगरानी करने वाले स्टेशन और आटोमैटिक सिंचाई प्रणालियों का इस्तेमाल करने लगे हैं।

    मैन्युफैक्चरिंग : विनिर्माण उद्योग आइओटी-संचालित मशीनों पर निर्भर होते जा रहे हैं, जो उपकरण खराब होने से पहले ही मेंटीनेंस की जरूरत का पता लगा लेती हैं। पूर्वानुमानित रखरखाव से डाउनटाइम कम होता है और उत्पादकता बढ़ती है।

    यातायात : कनेक्टेड गाड़ियों, जीपीएस नेविगेशन, इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम और लाजिस्टिक्स ट्रैकिंग की वजह से ट्रांसपोर्टेशन स्मार्ट हो गया है। इससे डिलीवरी तेजी से होती है, सड़कें अधिक सुरक्षित हैं और ईंधन की खपत भी कम होती है।

    तकनीकें, जिन्होंने आइओटी को बनाया कमाल

    सेंसर और एक्चुएटर: सेंसर आसपास होने वाले बदलावों, जैसे तापमान, नमी, रोशनी, हलचल या दबाव का पता लगा सकते हैं। वहीं, एक्चुएटर भौतिक बदलाव कर सकते हैं, जैसे वाल्व खोलना या बंद करना या मोटर चालू करना। आटोमेशन तब संभव होता है, जब सेंसर और एक्चुएटर इंसानी दखल के बिना समस्याओं को स्वत: हल कर सकें।

    कनेक्टिविटी टेक्नोलाजी: सेंसर और एक्चुएटर से क्लाउड तक आइओटी डाटा भेजने के लिए, आइओटी डिवाइस का इंटरनेट से कनेक्ट होना जरूरी है। इनमें कई तरह की कनेक्टिविटी टेक्नोलाजी का इस्तेमाल किया जाता है, जैसे वाइ-फाइ, ब्लूटूथ, सेल्युलर आदि।

    क्लाउड कंप्यूटिंग: क्लाउड में आइओटी डिवाइस से बनने वाले बहुत सारे डाटा को स्टोर, प्रोसेस और एनालाइज किया जाता है। क्लाउड कंप्यूटिंग प्लेटफार्म वे इन्फ्रास्ट्रक्चर और टूल उपलब्ध कराते हैं जिनकी जरूरत इस डाटा को स्टोर और एनालाइज करने, साथ ही आइओटी एप्लीकेशन बनाने और उन्हें डिप्लाय करने के लिए होती है।

    बिग डाटा एनालिटिक्स: आइओटी डिवाइस के डाटा को समझने के लिए, कंपनियों को जानकारी निकालने और पैटर्न की पहचान करने के लिए एडवांस्ड एनालिटिक्स टूल की जरूरत होती है। इन टूल में मशीन लर्निंग एल्गोरिदम, डाटा विजुअलाइजेशन टूल और प्रिडिक्टिव एनालिटिक्स माडल शामिल होते हैं।

    सुरक्षा और प्राइवेसी टेक्नोलाजी: आइओटी डिवाइस और उनसे बनने वाले डाटा को साइबर खतरों से बचाने के लिए एन्क्रिप्शन, एक्सेस कंट्रोल और घुसपैठ का पता लगाने वाले सिस्टम (इंट्रूजन डिटेक्शन सिस्टम) जैसी टेक्नोलाजी का इस्तेमाल किया जाता है।

    जोखिम और चुनौतियां भी हैं ढेर सारी

    सुरक्षा और प्राइवेसी से जुड़े जोखिम: कई आइओटी डिवाइस हैकर्स और दूसरे साइबर खतरों के प्रति संवेदनशील होते हैं, जिससे संवेदनशील डाटा की सुरक्षा और प्राइवेसी खतरे में पड़ सकती है। ये खुद बहुत सारा पर्सनल डाटा भी इकट्ठा कर सकते हैं, जिससे प्राइवेसी और डाटा सुरक्षा को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं।

    इंटरआपरेबिलिटी (आपसी तालमेल) की समस्याएं: डिवाइसेज अक्सर अलग-अलग स्टैंडर्ड और प्रोटोकाल का इस्तेमाल करती हैं, जिससे उनके बीच "मशीन-टू-मशीन" कम्युनिकेशन करना मुश्किल हो सकता है। इससे इंटरआपरेबिलिटी की समस्याएं हो सकती हैं।

    डेटा ओवरलोड: आइओटी डिवाइसेज बड़ी मात्रा में डाटा बनाती हैं। इसका विश्लेषण और उससे काम की जानकारी निकालना एक बड़ी चुनौती है, खासकर उन कंपनियों के लिए जिनके पास जरूरी एनालिटिक्स टूल और विशेषज्ञता नहीं है।

    लागत और जटिलता: आइओटी सिस्टम को लागू करना महंगा और जटिल हो सकता है, क्योंकि इसके लिए हार्डवेयर, साफ्टवेयर और इन्फ्रास्ट्रक्चर में बड़े निवेश की जरूरत होती है। सिस्टम को मैनेज करना और उसका रखरखाव करना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जिसके लिए खास कौशल और विशेषज्ञता की जरूरत होती है।

    रेगुलेटरी और कानूनी चुनौतियां: जैसे-जैसे इन डिवाइस का इस्तेमाल बढ़ रहा है, रेगुलेटरी और कानूनी चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। कंपनियों को डाटा सुरक्षा, प्राइवेसी और साइबर सुरक्षा से जुड़े अलग-अलग नियमों का पालन करना होता है।

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