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    USB-C के बाद अब बैटरी की बारी, क्या यूरोप के इस फैसले से भारतीय मोबाइल यूजर्स की भी होगी मौज?

    Updated: Tue, 21 Apr 2026 09:48 PM (IST)

    फरवरी 2027 से, EU कई डिवाइसेज में रिमूवेबल बैटरी होना जरूरी कर देगा। ये बदलाव फोन की मरम्मत को आसान बना सकता है, उनकी लाइफस्पैन बढ़ा सकता है और ग्लोबल ...और पढ़ें

    EU द्वारा फोन की बैटरी को लेकर नए नियम लाए जा रहे हैं। Photo- freepik.

    EU द्वारा फोन की बैटरी को लेकर नए नियम लाए जा रहे हैं। Photo- freepik.

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    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    टेक्नोलॉजी डेस्क, नई दिल्ली। आज हमारे पास ज्यादातर फोन और टैबलेट ऐसे डिजाइन के साथ आते हैं जो पूरी तरह से बंद (sealed) होते हैं। इनमें बैटरी अपनी जगह पर चिपकी होती है, जिन्हें निकालना या बदलना मुश्किल होता है। 2027 से इसमें बदलाव आना शुरू हो सकता है।

    यूरोपियन यूनियन के बैटरी नियमों के तहत, फोन, टैबलेट और कॉर्डलेस मोबाइल फोन को इस तरह से डिजाइन करना होगा कि उनकी बैटरी को डिवाइस या बैटरी को नुकसान पहुंचाए बिना निकाला और बदला जा सके। ये नियम 18 फरवरी, 2027 से लागू होगा और ये उस पूरी तरह से बंद हार्डवेयर डिजाइन से एक बदलाव की शुरुआत हो सकता है, जिसने एक दशक से भी ज्यादा समय से डिवाइस डिजाइन पर अपना दबदबा बनाए रखा है।

    EU बैटरी नियम: क्या अनिवार्य किया गया है?

    ये नियम इस बारे में साफ-साफ शर्तें तय करते हैं कि डिवाइस के अंदर बैटरियों को किस तरह से डिजाइन किया जाना चाहिए।

    इसका मेन मकसद ये है कि बैटरियां ऐसी होनी चाहिए जिन्हें निकाला भी जा सके और बदला भी जा सके। इसका मतलब है कि यूजर उन्हें डिवाइस को नुकसान पहुंचाए बिना सुरक्षित रूप से बाहर निकाल सकें और परफॉर्मेंस या सेफ्टी पर कोई असर डाले बिना उन्हें दूसरी बैटरी से बदल सकें।

    आम यूजर्स के लिए, ये काम बाजार में आसानी से मिलने वाले टूल्स से या बिना किसी टूल के भी हो जाना चाहिए। मैन्युफैक्चरर खास या स्पेशियलाइज्ड टूल्स पर निर्भर नहीं रह सकते, जब तक कि वे टूल्स प्रोडक्ट के साथ फ्री में न दिए जाएं। आसान शब्दों में कहें तो, इसका मतलब है कि यूजर बैटरियों को खुद ही बदल सकें और इसके लिए उन्हें किसी ऑथराइज्ड सर्विस सेंटर पर निर्भर न रहना पड़े।

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    ये नियम 'आम यूजर' (end user) की परिभाषा एक ऐसे एडल्ट के तौर पर देते हैं जिसके पास कोई खास तकनीकी ट्रेनिंग न हो। इससे ये साफ होता है कि ये प्रोसेस उन यूज़र्स के लिए भी आसान होनी चाहिए जो इस काम के एक्सपर्ट नहीं हैं। हालांकि, ये उतना आसान नहीं हो सकता जितना कि पुराने फीचर फोन में बैटरियां बदलने का सिस्टम हुआ करता था।

    कुछ खास कैटेगरी के लिए, जैसे कि हल्के वाहनों (LMT) में इस्तेमाल होने वाली बैटरियों में बैटरी बदलने का काम इंडिपेंडेंट प्रोफेशनल कर सकते हैं। ऐसे मामलों में, मैन्युफैक्चरर को ये पक्का करना होगा कि जरूरी टूल्स उचित और बिना सभी के लिए एक ही रेट पर उपलब्ध हों।

    किन डिवाइस पर असर पड़ेगा?

    ऑफिशियल डॉक्यूमेंट्स के अनुसार, जिन डिवाइस पर खास तौर से असर पड़ेगा, उनमें मोबाइल फोन, कॉर्डलेस फोन और स्लेट टैबलेट शामिल हैं। इन नियमों का मेन फोकस उन प्रोडक्ट पर है जिनकी बैटरियां फिलहाल डिवाइस के अंदर चिपकी या पूरी तरह से बंद होती हैं, जिससे उन्हें निकालना मुश्किल हो जाता है।

    सिर्फ मरम्मत से जुड़ा नियम नहीं

    वैसे, इन नियमों का सबसे साफ असर मरम्मत करने की सुविधा (repairability) पर दिखेगा। लेकिन ये नियम इससे कहीं ज्यादा बड़ा है। इनमें बैटरियों को सुरक्षित तरीके से संभालने और उनका सही तरीके से डिस्पोजल से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं। इनका मकसद ये पक्का करना है कि निकाली गई बैटरियों को सही कलेक्शन और ट्रिटमेंट सिस्टम तक पहुंचाया जाए। इसका मेन मकसद कचरा कम करना और बैटरियों के पूरे लाइफसाइकल में उनके मैनेजमेंट के तरीके को बेहतर बनाना है।

    ये नियम कब से लागू होंगे?

    EU बैटरी रेगुलेशन अगस्त 2023 में लागू हुआ और इसे अलग-अलग चरणों में लागू किया जाएगा। बैटरियों को निकालने और बदलने से जुड़ी शर्तें 18 फरवरी, 2027 से लागू होंगी।

    इसका भारत पर क्या असर पड़ सकता है?

    वैसे, ये रेगुलेशन सिर्फ यूरोपियन यूनियन के अंदर लागू होगा, लेकिन इसका असर सिर्फ इसी इलाके तक सीमित रहने की संभावना कम है। मैन्युफैक्चरर अक्सर लागत और सप्लाई चेन की मुश्किलों की वजह से अलग-अलग बाजारों के लिए अलग-अलग हार्डवेयर डिजाइन बनाने से बचते हैं। नतीजतन, EU की शर्तों को पूरा करने के लिए डिजाइन किए गए डिवाइस अक्सर पूरी दुनिया में लॉन्च किए जाते हैं।

    USB-C चार्जिंग पोर्ट के मामले में भी ऐसा ही बदलाव देखने को मिला था। जब EU ने इस स्टैंडर्ड को जरूरी बना दिया, तो कंपनियों ने इसे सभी बाजारों में अपनाना शुरू कर दिया और बाद में भारत में भी इसी तरह के नियम लागू किए गए।

    अगर यही सिलसिला जारी रहता है, तो भारत जैसे बाजारों में भी ग्राहकों को ऐसे डिवाइस मिल सकते हैं जिनकी मरम्मत करना ज्यादा आसान होगा।

    सार ये है कि EU का आने वाला बैटरी नियम सिर्फ एक रेगुलेटरी बदलाव नहीं है, बल्कि यह डिवाइस के डिजाइन और रखरखाव के तरीके में एक संभावित बड़ा बदलाव है। ग्राहकों के लिए, इसका मतलब ऐसे डिवाइस हो सकते हैं जिनकी मरम्मत करना ज्यादा आसान हो, जो ज्यादा मज़बूत हों और ज्यादा समय तक चलें।

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