जवानी में दर्ज हुआ मुकदमा और बुढ़ापे में मिला न्याय, अयोध्या में 43 साल बाद दोषमुक्त हुए कल्पनाथ
कल्पनाथ को 43 साल बाद अयोध्या न्यायालय से न्याय मिला, युवावस्था में दर्ज आपराधिक मामले में बुढ़ापे में दोषमुक्त हुए। टांडा थर्मल पावर से जुड़े इस मामल ...और पढ़ें

लड़ते-लड़ते कमर झुक गई तब मिला न्याय।
HighLights
कल्पनाथ को 43 साल बाद अयोध्या न्यायालय से न्याय मिला।
युवावस्था में दर्ज आपराधिक मामले में बुढ़ापे में दोषमुक्त हुए।
टांडा थर्मल पावर से संबंधित था यह पुराना मामला।
जागरण, संवाददाता अयोध्या। बस्ती जिले के एक गांव निवासी कल्पनाथ को 43 साल बाद आखिरकार न्यायालय से न्याय मिल गया। युवावस्था में दर्ज कराए गए आपराधिक मामले में निर्णय आते-आते उनका शरीर जर्जर हो गया और कमर झुक गई। न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय ने जब उन्हें दोषमुक्त किया तो बुढ़ापे में कल्पनाथ की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े।
कल्पनाथ के विरुद्ध इब्राहीमपुर थाने में टांडा थर्मल पावर के अधिकारी पर आपराधिक बल प्रयोग करने तथा मिर्च जला कर वायुमंडल को प्रदूषित करने संबंधी अन्य आरोप लगाए गए थे। यह थाना तब इसी जिले में था। मुकदमे के दौरान अब यह थाना अंबेडकरनगर जिले के अंतर्गत आ चुका है।
26 अगस्त 1983 की शाम करीब सवा पांच बजे यह घटना टांडा थर्मल प्रोजेक्ट परिसर की बताई गई थी। कल्पनाथ राजकीय निर्माण निगम के अधीन हो रहे कार्य में मजदूर के तौर पर कार्य करते थे। घटना की प्राथमिकी दूसरे दिन दर्ज कराई गई, जिसमें कल्पनाथ विश्वकर्मा के साथ अन्य मजदूर इशरत अली उर्फ इतरत अली को भी नामजद किया गया था।
कल्पनाथ को तो जेल भेज दिया गया लेकिन इशरत अली का पता पुलिस आज तक नहीं लगा सकी। इशरत अली के विरुद्ध मुकदमा आज भी इसी न्यायालय में विचाराधीन है। कई दिनों बाद कल्पनाथ की जमानत हो सकी। इब्राहीमपुर पुलिस ने दोनों के विरुद्ध आरोपपत्र न्यायालय भेजा था। 30 मई 1985 को न्यायालय ने आरोप पत्र पर संज्ञान लेकर वाद की कार्रवाई शुरू की।
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करीब साढ़े 10 साल बाद 27 नवंबर 1995 को न्यायालय में आरोपित का बयान दर्ज किया गया। जिसके बाद यह मामला तारीख पर तारीख के साथ चलता रहा। वक्त के साथ-साथ कल्पनाथ की उम्र ढलती चली गई।
शुक्रवार को कल्पनाथ झुकी हुई कमर के साथ न्यायालय के समक्ष पेश हुए। न्यायालय के निर्णय से उनका लंबा कष्टकारी सफर थम गया। यद्यपि उनका सफर अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
अपराधों से दोषमुक्त होने के बाद भी सप्ताह भर के भीतर उन्हें इस आशय की दो जमानतें देनी पड़ेंगी कि अपील होने की दशा में उन्हें न्यायालय का फिर से सामना करना पड़ेगा। उन्हें न्याय दिलाने में अधिवक्ताओं आरपी पांडेय, वीरेंद्र प्रताप सिंह व शुभम गुप्त की अहम भूमिका रही।