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    रूस-यूक्रेन युद्ध में बलिदान चार भारतीयों के नहीं मिले शव, तो सैन्य वर्दी का ही कर दिया अंतिम संस्कार

    Updated: Sat, 18 Jul 2026 11:25 PM (IST)

    रूस-यूक्रेन युद्ध में आजमगढ़ और मऊ के चार युवकों की मौत हो गई, जिनके शव नहीं मिल सके। परिवारों ने उनकी सैन्य वर्दी, टोपी और प्रमाण पत्र को ही अंतिम नि ...और पढ़ें

    जोगेंद्र यादव, अरविंद कुमार और धीरेंद्र कुमार, फाइल फोटो

    जोगेंद्र यादव, अरविंद कुमार और धीरेंद्र कुमार, फाइल फोटो

    HighLights

    1. चार भारतीय युवक रूस-यूक्रेन युद्ध में मारे गए।

    2. शव न मिलने पर सैन्य वर्दी से अंतिम संस्कार।

    3. एजेंटों ने नौकरी का झांसा देकर युद्ध में भेजा।

    जागरण संवाददाता, आजमगढ़। रूस-यूक्रेन युद्ध ने आजमगढ़ और मऊ के चार परिवारों से उनके जवान बेटे तो छीन ही लिए, उनकी अंतिम विदाई का अधिकार भी नहीं मिल सका। बलिदानियों के शव या अवशेष तक नहीं मिलने पर परिवारों ने रूस से आई उनकी सेना की वर्दी, टोपी, बैज, ध्वज और मृत्यु प्रमाणपत्र को ही अपने बेटों की अंतिम निशानी मानकर पूरे रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया। यह दृश्य जिसने भी देखा, उसकी आंखें नम हो गईं।

    आजमगढ़ के योगेंद्र यादव, धीरेंद्र कुमार और अरविंद कुमार को मऊ के विनोद यादव ने विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर दिल्ली के एजेंट सुमित से मिलवाया था। स्वजन के अनुसार, प्लंबर और सुरक्षा गार्ड की नौकरी का झांसा देकर जनवरी 2024 में चारों को रूस भेजा गया, लेकिन वहां पहुंचने के बाद उन्हें रूसी सेना में भर्ती कर यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में उतार दिया गया।

    युद्ध के दौरान योगेंद्र और विनोद की यूक्रेन के जापोरिजिया, जबकि अरविंद और धीरेंद्र की लुहान्स्क में मौत हो गई। इस दुखद कहानी में जालंधर निवासी जगदीप कुमार उम्मीद की कड़ी बने। उनका भाई भी काम के सिलसिले में रूस गया था और युद्ध में मारा गया। जनवरी 2026 में काफी प्रयास के बाद वह अपने भाई का शव भारत ला सके।

    इसी दौरान मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास से उन्हें आजमगढ़ और मऊ के चार युवकों की मौत की जानकारी मिली। शव उपलब्ध न होने पर दूतावास ने चारों की वर्दी, टोपी, बैज, रूसी ध्वज और मृत्यु प्रमाण पत्र उन्हें सौंप दिए।

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    जगदीप इन अंतिम निशानियों को लेकर शुक्रवार को आजमगढ़ पहुंचे और कलेक्ट्रेट से जानकारी लेकर संबंधित परिवारों तक पहुंचाया। योगेंद्र के परिवार ने शुक्रवार को, जबकि धीरेंद्र, अरविंद और विनोद के परिवार ने शनिवार को वर्दी और ध्वज को बेटे का प्रतीक मानकर अंतिम संस्कार किया।

    योगेंद्र के छोटे भाई आशीष ने बताया कि 15 जनवरी 2024 को भाई रूस गए थे। मई 2024 में उनसे फोन पर आखिरी बार बात हुई थी। बाद में सूचना मिली कि विस्फोट में उनका शरीर पूरी तरह नष्ट हो गया, इसलिए शव नहीं मिल सका।

    उन्होंने नौकरी का झांसा देकर युवकों को युद्ध में झोंकने वाले एजेंटों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि दोषियों को ऐसी सजा मिले, ताकि फिर किसी परिवार को इस असहनीय पीड़ा से न गुजरना पड़े। आजमगढ़ के नौ और मऊ के चार युवक रूस गए थे। इनमें 11 की मौत हो चुकी है। दो अब भी लापता बताए जा रहे हैं।

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