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    हाई कोर्ट का 42 साल बाद बड़ा फैसला: पूर्व यूपी पुलिस कांस्टेबल की सजा घटाई, 35 हजार मुआवजा देने का आदेश

    Updated: Wed, 29 Jul 2026 04:25 PM (IST)

    इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 42 साल पुराने हत्या के प्रयास के मामले में पूर्व कांस्टेबल बक्स उल्लाह की सजा छह से घटाकर चार साल कर दी है। कोर्ट ने पीड़ित को 3 ...और पढ़ें

    इलाहाबाद हाई कोर्ट

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    HighLights

    1. छह से चार साल की अवधि की, पीड़ित को 35 हजार रुपये का मुआवजा देने का निर्देश

    विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1984 में हत्या की कोशिश के अभियुक्त पूर्व पुलिस कांस्टेबल बक्स उल्लाह की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है, लेकिन सजा घटा कर छह से चार साल कर दी है। जुर्माना भी 600 रुपये से बढ़ाकर 40 हजार रुपये करते हुए इसमें पीड़ित को 35 हजार रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है।

    न्यायमूर्ति संतोष राय की एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि अपील 41 साल से लंबित थी (जिसमें दोषी की कोई गलती नहीं थी) और वह अब 60 साल से अधिक उम्र का हो चुका है। रिकार्ड पर मौजूद सुबूतों से अभियोजन पक्ष का मामला पूरी तरह साबित था। इसलिए कोर्ट ने धारा 307 के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन आपराधिक अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली।

    यह अपील पीलीभीत के स्पेशल जज/एडिशनल सेशन जज के 1985 के उस फैसले के खिलाफ थी, जिसमें उसे हत्या की कोशिश का दोषी ठहराते हुए छह साल की कठोर कैद और 600 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। अपीलकर्ता घटना के समय बरेली में पुलिस कांस्टेबल था। आरोप है कि बिना छुट्टी लिए वह अपने हेडक्वार्टर से निकलकर अपने गृहनगर बीसलपुर आ गया।

    उसने 21 अगस्त 1984 को चाकू से अपने आध्यात्मिक गुरु (पीर सैयद अयूब अली) पर हमला किया। उसका कहना था कि गुरु टेप रिकार्डर चोरी के आरोप में उसे बदनाम कर रहे हैं। पीड़ित जब अस्पताल की ओर भागने की कोशिश कर रहा था तो उसका पीछा किया और उस पर चाकू से कई वार किए।

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    ट्रायल कोर्ट ने घायल की गवाही, चश्मदीद गवाहों के बयानों और सहायक मेडिकल सुबूतों के आधार पर सितंबर 1985 में अपीलकर्ता को दोषी ठहराया। हाई कोर्ट में अपीलार्थी ने इस आधार पर दोषसिद्धि को चुनौती दी कि चश्मदीद गवाह घायल व्यक्ति के शिष्य और करीबी सहयोगी होने के कारण पक्षपाती और हितबद्ध थे।

    यह भी दलील दी गई कि घटना के सही समय और जगह को लेकर संदेह था, क्योंकि उस जगह पर खून के निशान नहीं मिले थे जहां कथित तौर पर हमला शुरू हुआ। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि धारा 357 के तहत मुआवजे के रुपये घायल व्यक्ति को अथवा यदि उसकी मृत्यु हो गई है तो उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को दिए जाएं।

    जमानत पर चल रहे अपीलार्थी को निर्देश दिया गया कि वह अपनी बाकी सजा काटने के लिए दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने समर्पण करे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि अपीलार्थी धारा 428 के तहत उस अवधि के लिए सजा में कटौती का हकदार होगा, जो उसने पहले ही विचाराधीन कैदी के तौर पर और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा के तहत बिताई है।

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