कांवड़ यात्रा पूरी कर मढ़ीनाथ मंदिर पहुंचे भक्तों ने पकड़े कान, फिर लगाई उठक-बैठक; वजह जानकर आप भी करेंगे प्रणाम
बरेली के मढ़ीनाथ मंदिर में कांवड़ियों ने जलाभिषेक के बाद कान पकड़कर उठक-बैठक लगाई। जानें आखिर क्यों निभाई जाती है कांवड़ियों द्वारा यह अनोखी परंपरा। ...और पढ़ें
HighLights
अनाेखी परंपरा ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा
मनीस पांडेय, बरेली। सावन के पवित्र महीने में इस समय रुहेलखंड का नाथनगरी बरेली पूरी तरह से शिवमय हो चुकी है। शहर के प्रसिद्ध नाथ मंदिरों और तमाम शिवालयों में सुबह से लेकर देर शाम तक शिव भक्तों का तांता लगा हुआ है। हर तरफ हर-हर महादेव और बम-बम भोले के जयकारों से वातावरण गूंज रहा है।
एक तरफ जहां बदायूं के पावन कछला घाट से गंगाजल लाकर भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करने का सिलसिला जारी है, वहीं दूसरी ओर मढ़ीनाथ मंदिर परिसर में एक बेहद अनूठी और प्रेरणादायक परंपरा देखने को मिली, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

जलाभिषेक के बाद कान पकड़कर लगाई उठक-बैठक
मढ़ीनाथ मंदिर परिसर में कांवड़ यात्रा पूरी करने के बाद कांवड़ संघ के सदस्यों ने एक अनूठी मिसाल पेश की। जलाभिषेक करने के तुरंत बाद इन शिव भक्तों ने मंदिर परिसर में ही अपने कान पकड़कर उठक-बैठक लगानी शुरू कर दी।
यह कोई एक या दो बार नहीं, बल्कि अपनी श्रद्धा और समर्पण के भाव के साथ 11, 21 और यहां तक कि 51 बार तक लगाई गई। इस अनोखे दृश्य को देखकर मंदिर में मौजूद अन्य श्रद्धालु भी हैरान रह गए, लेकिन जब इसके पीछे का कारण सामने आया, तो हर किसी के मन में इन कांवड़ियों के प्रति सम्मान और बढ़ गया।
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क्यों निभाई जाती है यह परंपरा
कांवड़ संघ के सदस्य अभिषेक यादव ने इस परंपरा के पीछे का कारण विस्तार से बताया। उन्होंने साझा किया कि वे सभी रविवार की शाम को वाहनों से बदायूं के कछला घाट पहुंचे थे और वहां से संकल्प लेकर पैदल ही गंगाजल लेकर वापस बरेली लौटे हैं।
अभिषेक ने बताया कि कांवड़ यात्रा के दौरान 12 घंटे या उससे अधिक के इस कठिन सफर में कड़े नियमों और सावधानियों का पालन करना होता है। यात्रा के दौरान कई तरह के अनुशासन का ध्यान रखना पड़ता है, जैसे: यात्रा मार्ग पर विश्राम और अन्य जरूरी क्रियाओं के दौरान नियमों का पालन। खान-पान और पवित्रता को लेकर कड़े प्रोटोकाल।

अंधेरे, थकान और कठिन परिस्थितियों के कारण कई बार अनजाने में कुछ छोटी-मोटी त्रुटियां या अशुद्धियां हो जाती हैं। अपनी इन्हीं अनजाने में हुई गलतियों की क्षमा मांगने के लिए सभी कांवड़िए भगवान शिव के दरबार में पहुंचकर कान पकड़कर उठक-बैठक लगाते हैं। वे भोलेनाथ से प्रार्थना करते हैं कि उनकी यात्रा के दौरान हुई किसी भी भूल को क्षमा कर उन्हें अपनी शरण में स्थान दें।
मौसम ने दिया साथ, उमड़ी भारी भीड़
इस बार सावन के दौरान मौसम भी शिव भक्तों का पूरा साथ दे रहा है। सुबह के समय हल्की धूप जरूर निकली, लेकिन दिन चढ़ते ही आसमान में बादल छा गए, जिससे कांवरियों और श्रद्धालुओं को कड़ी धूप और उमस से काफी राहत मिली।
लगी रही लंबी कतारें
सुबह से लेकर दोपहर 12 बजे तक शहर के सभी नाथ मंदिरों में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। दोपहर के विश्राम के बाद जैसे ही शाम ढलनी शुरू हुई, मंदिरों में एक बार फिर से भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा।
लोग लोटों और डिब्बों में दूध, गंगाजल और पवित्र जल भरकर भगवान शिव का जलाभिषेक कर रहे हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं। बरेली के इन शिवालयों में गूंजता भक्ति का यह स्वर इस बात का प्रमाण है कि सनातन संस्कृति में आस्था और अनुशासन का यह पावन पर्व कितनी गहराई से रचा-बसा है।