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    80 हजार किसानों पर मंडराया संकट: बहेड़ी और नवाबगंज चीनी मिलें बिकने की कगार पर, 1650 परिवारों की रोजी-रोटी खतरे में

    Updated: Sat, 25 Jul 2026 07:11 PM (IST)

    बरेली की बहेड़ी और नवाबगंज चीनी मिलें बिकने की कगार पर हैं, जिससे 80 हजार किसानों और 1650 कर्मचारियों की आजीविका खतरे में है। किसानों का करोड़ों रुपये ...और पढ़ें

    ओसवाल चीनी मिल। जागरण

    ओसवाल चीनी मिल। जागरण

    HighLights

    1. 450 स्थायी और 1200 सीजनल कर्मचारियों का छिन जाएगी रोजी-रोटी

    2. हाईवे किनारे 100 करोड़ की जमीन 28.05 करोड़ में नीलामी से विवाद

    जागरण टीम, बरेली। वर्षों तक किसानों की आर्थिक मजबूती का आधार जिले की चीनी मिलें अब बिकने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। इनके प्रबंधन ने किसानों का करोड़ों रुपये का भुगतान नहीं किया। नीलामी के बाद तय है कि ये मिलें फिर नहीं चल पाएंगीं। किसानों के हितों के लिए सरकार किसानों को बकाया भुगतान कर दे और खुद इन मिलों का संचालन संभालें... ऐसा हो सकता है जब स्थानीय जनप्रतिनिधि और अधिकारी इस बात को समझें, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा क्योंकि कोई इसमें रुचि नहीं ले रहा है।

    वजह साफ है, उन पर भूमाफियाओं का दबाव है या फिर उनकी सीधी साठगांठ हो गई है। तभी तो लंबे समय से इन चीनी मिलों की भूमि बेचने के प्रयास किए जा रहे हैं। अगर बहेड़ी और नवाबगंज की चीनी मिलें बंद हुई तो करीब 80 हजार किसान बर्बाद हो जाएंगे।

    बहेड़ी : केसर चीनी मिल की स्थापना 1933 में किलाचंद समूह ने कराई थी। स्टीम इंजन हालैंड से आयात किया गया था। यह क्षेत्र की सबसे पुरानी और प्रमुख औद्योगिक इकाइयों में से एक है। शुरूआत में चीनी मिल की पेराई क्षमता 800 टन प्रतिदिन थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 7200 टन प्रतिदिन कर दिया गया था।

    मिल केवल चीनी उत्पादन तक सीमित नहीं है, गन्ने के उप-उत्पादों शीरा और खोई का उपयोग किया। परिसर में डिस्टिलरी (शराब और इथेनाल) और खोई आधारित कोजेनरेशन पावर प्लांट भी संचालित किए जा रहे हैं। चीनी मिल पर किसानों का 146 करोड़ रुपये का गन्ना मूल्य बकाया होने के कारण मिल प्रबंधन और किसानों के बीच तनाव की स्थिति बनी।

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    बकाया गन्ना मूल्य भुगतान कराने के लिए मिल प्रबंधन के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई। आरसी जारी कर संपत्तियां कुर्क कर नीलाम की जाने लगी है। तहसील प्रशासन ने 31 मई को केसर चीनी मिल की 11.447 हेक्टेयर जमीन 28.05 करोड़ रुपये में नीलाम की थी, जिसे कारोबारी आदेश पांडे ने खरीदा था।

    इस पर जागरण ने सवाल उठाया तो किसानों और राजनेताओं ने भी 100 करोड़ की संपत्ति को मिलीभगत से कम कीमत में बेचने का मुद्दा उठाया। गन्ना समिति बोर्ड ने पुरानी नीलामी रद कर नए सिरे से प्रक्रिया चलाने की मांग की।

    इसके बाद प्रशासन बैकफुट पर आया और अधिक बोली लगाने वालों को आमंत्रित किया। जिसके बाद नए खरीदारों ने डिमांड ड्राफ्ट जमा किए हैं। अब एक अगस्त को नया सर्किल रेट जारी होने के बाद दोबारा नीलामी की तैयारी की जा रही है, लेकिन चीनी मिल को बचाने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है।

    नवाबगंज : ओसवाल चीनी मिल की स्थापना 1996 में हुई थी, इसके लिए पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार ने अतिरिक्त प्रयास किया था। पेराई क्षमता 300 टन प्रतिदिन है। चीनी मिल का संचालन शुरू होने के बाद क्षेत्रीय किसानों की आर्थिक उन्नति हुई थी। क्षेत्र में गन्ने का रकबा बढ़ा और करीब 40 हजार किसान परिवार चीनी मिल से जुड़ गए।

    मिल में 50 स्थायी कर्मचारियों के अलावा 300 सीजनल कर्मचारी भी कार्य करते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से चीनी मिल की आर्थिक स्थिति खराब हो गई और 55 करोड़ का गन्ना मूल्य बकाया हो गया। मिल प्रबंधन पर प्राथमिकी दर्ज कराने और आरसी जारी होने के बाद भी भुगतान नहीं हुआ तो मिल नीलामी की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

    गुजरे पेराई सत्र में शासन से इस मिल का गन्ना आवंटन ही नहीं किया गया, अब यह मिल बंदी के कगार पर पहुंच गई है। मूल्यांकन के लिए पुणे महाराष्ट्र से तकनीकी टीम बुलाई गई है। चीनी मिल बंद होने से चंद पूंजीपितियों को लाभ हो सकता है, लेकिन हजारों किसानों और कर्मचारियों के सामने आर्थिक संकट गहरा जाएगा।

     

    किसानों को अगर मिल ही बंद करना होती तो वे गन्ना आपूर्ति रोककर मिल बंद कर देते। जरूरत है किसानों का भुगतान का उपाय किए जाने की और साथ ही नौ दशक से ज्यादा क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां का केंद्र रही मिल को सरकारी सहारा दिए जाने की।

    - चौधरी ओमवीर सिंह, निदेशक, गन्ना समिति बहेड़ी

     

    हम अपने स्रोतों और उपायों से भरसक प्रयास कर रहे हैं कि मिल बंद न हो क्योंकि मिल बंद होने से हजारों परिवार प्रभावित होंगे और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। किसानों के भुगतान के भी तमाम प्रयास किए जा रहे हैं पर अभी तक सफलता नहीं मिली है। आशा है कि मिल को बचाने के प्रयास और किसान के भुगतान मामलों में अच्छा होगा। इस समय मिल आर्थिक संकट में है इससे इन्कार नहीं किया जा सकता।

    - शरत मिश्र, अध्यक्ष केसर चीनी मिल बहेड़ी


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