द्रास की दुर्गम चोटियों पर 1-नागा रेजिमेंट का पराक्रम: बर्फीली चोटियों पर दुश्मनों को चटाई थी धूल
भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध में 1-नागा रेजिमेंट और सिपाही प्रह्लाद सिंह के अदम्य साहस को याद किया। रेजिमेंट ने द्रास की दुर्गम चोटियों पर दुश्मनों को ...और पढ़ें

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वन-नागा रेजिमेंट के सिपाही प्रह्लाद सिंह ने भी कारगिल युद्ध में दुश्मनों से लिया था सीधा मोर्चा
जागरण संवाददाता, बरेली। भारतीय सेना के वीरता, शौर्य और पराक्रम का प्रतीक कारगिल युद्ध की जीत को याद कर देश एक बार फिर गर्व से भर उठा है। वर्ष-1999 में भारतीय सेना की अलग रेजिमेंट और टुकड़ियों ने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया। इसमें वन-नागा रेजिमेंट का असाधारण साहस, दृढ़ संकल्प और उच्च पर्वतीय युद्ध कौशल का परिचय देते हुए इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कराया।
उस समय सिपाही प्रह्लाद सिंह (बाद में आनरेरी लेफ्टिनेंट) वन-नागा रेजिमेंट का हिस्सा थे। उन्होंने कारगिल की अत्यंत कठिन परिस्थितियों में अदम्य साहस, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए दुश्मन के सामने वीरता से मोर्चा संभाला।
कारगिल युद्ध में शामिल होने का गौरव लिए आनरेरी लेफ्टिनेंट प्रह्लाद सिंह बताते हैं कि उस समय उनकी प्लाटून की कमान मेजर एसएस. त्रिपाठी के हाथों में थी, जिनके कुशल नेतृत्व, रणनीतिक मार्गदर्शन और प्रेरणा में जवानों ने कारगिल की दुर्गम चोटियों पर वीरता का परिचय दिया।
11 मई 1999 को वन-नागा रेजिमेंट द्रास पहुंचने वाली भारतीय सेना की पहली बटालियन थी। अत्यंत कठिन मौसम, बर्फीली ऊंचाइयों और दुश्मन की मजबूत स्थिति के बावजूद नागा वीरों ने मोर्चा संभाला और आपरेशन विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
रेजिमेंट ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ब्लैक राॅक और ब्लैक टूथ जैसी ऊंचाइयों पर कब्जा करने के लिए अदम्य साहस का प्रदर्शन किया। इन चोटियों से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने में वन-नागा के जवानों का योगदान निर्णायक एवं अविस्मरणीय रहा।
प्रह्लाद बताते हैं की कारगिल युद्ध में मेजर एसएस त्रिपाठी के निर्देशन में वन-नागा रेजिमेंट (प्रथम बटालियन) उन शुरुआती भारतीय सेना की बटालियनों में शामिल थी, जिन्हें करगिल मोर्चे पर तैनात किया गया। द्रास सेक्टर की दुर्गम और दुश्मन के कब्जे वाली चोटियों पर इस बटालियन ने अदम्य साहस, वीरता और सर्वोच्च बलिदान का परिचय दिया।
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अभियान के दौरान 10 जवान हुए थे बलिदान
इस अभियान के दौरान वन-नागा रेजिमेंट के दस वीर जवानों ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया, जबकि 52 अन्य सैनिक युद्ध में घायल हुए। उनके अद्वितीय शौर्य और बलिदान की गाथा भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
सैनिकों ने साहस, समर्पण और बलिदान की ऐसी मिसाल पेश की, जो भारतीय सेना की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है। सेवा में बेहतर योगदान पर सिपाही प्रह्लाद सिंह ने पदोन्नति प्राप्त की और आनरेरी लेफ्टिनेंट का गौरव हासिल किया। वन-नागा रेजिमेंट और उसके वीर जवानों की गाथा आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
राष्ट्र उनके साहस, सेवा और बलिदान को नमन करता है। मूलतः पिथौरागढ़ निवासी आनरेरी प्रह्लाद सिंह वर्तमान में बरेली के सिविल लाइन में निवास करते हैं। प्रह्लाद बताते हैं की वो इस पूरे युद्ध में अदम्य साहस दिखाने के लिए वन-नागा रेजिमेंट को सेना की तरफ से प्रतिष्ठित 'बैटल आनर - द्रास' और 'थिएटर आनर-कारगिल' से सम्मानित किया गया।