पुष्पा मूवी की तर्ज पर कफ सिरप का काला कारोबार, अलीनगर-मुगलसराय बने तस्करी के गलियारे; कई राज्यों तक नेटवर्क
चंदौली के अलीनगर और मुगलसराय में 'पुष्पा' फिल्म की तर्ज पर बड़े पैमाने पर कफ सिरप की तस्करी हो रही है, जिससे पूर्वांचल एक बड़ा नशीली दवा ट्रांजिट रूट ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए तस्वीर को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।
HighLights
अलीनगर-मुगलसराय में पुष्पा फिल्म की तर्ज पर कफ सिरप तस्करी।
संगठित नेटवर्क, गुप्त तरीके, भारी मुनाफा, कई राज्यों तक फैला।
पुलिस की चुनौती: नेटवर्क के सरगनाओं तक पहुंचना आवश्यक।
जागरण संवाददाता, पीडीडीयू नगर (चंदौली)। फिल्म पुष्पा में लाल चंदन की तस्करी का कारोबार पुलिस की आंखों में धूल झोंककर चलता था। कभी ट्रक के गुप्त केबिन में माल छिपाया जाता तो कभी ऊपर से सामान्य सामान लादकर नीचे प्रतिबंधित सामग्री भेजी जाती। चंदन की जगह यहां कोडीनयुक्त कफ सिरप है, रास्ते अलग-अलग हैं, लेकिन खेल वही।
गुप्त ठिकाने, फर्जी कागजात, छद्म परिवहन और मोटा मुनाफा। अलीनगर व मुगलसराय कोतवाली क्षेत्र में लगातार सामने आ रही कफ सिरप की बरामदगी ने पूर्वांचल को नशीली दवाओं के बड़े ट्रांजिट रूट के रूप में जांच एजेंसियों के रडार पर ला दिया है।
अलीनगर क्षेत्र में हाल के दिनों में कफ सिरप की बड़ी खेप पकड़े जाने के बाद अब मुगलसराय क्षेत्र में भी तस्करी का नेटवर्क सामने आया है। रौना के पास नौ बोरों में करीब 1800 बोतल कफ सिरप बरामद की गई। वहीं अलीनगर के कैली क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में बोतलें मिलने से पुलिस की चिंता बढ़ गई है।
अलग-अलग स्थानों से बरामदगी के बावजूद जिस तरह कफ सिरप की खेप सामने आ रही है। उससे साफ है कि यह महज छोटे स्तर के तस्करों का खेल नहीं है। इसके पीछे आपूर्ति, भंडारण, परिवहन और बिक्री का संगठित नेटवर्क सक्रिय है। तस्करों का तरीका भी फिल्मी अंदाज से कम नहीं है।
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चावल की बोरियों, चिप्स-नमकीन के कार्टन अथवा अन्य सामानों के बीच कफ सिरप की पेटियां छिपाकर भेजी जाती हैं। कई मामलों में वाहनों में गुप्त केबिन बनाए जाने की बात सामने आई है। कुछ जगहों पर जमीन के नीचे या सामानों के बीच खेप छिपाने का तरीका अपनाया गया। सामान्य जांच में पुलिस की नजर से बचने के लिए तस्कर मार्ग बदलते रहते हैं।
एक खेप पकड़े जाने के बाद दूसरी खेप के लिए नया रास्ता और नया वाहन इस्तेमाल किया जाता है। इस काले कारोबार का सबसे बड़ा आकर्षण मुनाफा है। करीब 140 रुपये कीमत वाली कफ सिरप की बोतल नशे के बाजार में 400 से 500 रुपये तक बिकती है। शराबबंदी वाले बिहार समेत अन्य क्षेत्रों में इसकी मांग ने तस्करों के कारोबार को और बढ़ाया है।
कम समय में कई गुना मुनाफा कमाने के लालच में यह नेटवर्क युवाओं को नशे की गिरफ्त में धकेल रहा है। जांच एजेंसियों के अनुसार कफ सिरप का यह नेटवर्क उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड व मध्य प्रदेश से लेकर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तक फैला हुआ है। प्रवर्तन निदेशालय, एसटीएफ व विभिन्न राज्यों की पुलिस की कार्रवाई में कई ठिकानों पर छापेमारी, गिरफ्तारियां और लाइसेंस निरस्तीकरण की कार्रवाई हो चुकी है।
जांच एजेंसियां इस नेटवर्क की आर्थिक रीढ़ तोड़ने के लिए धन के लेनदेन, संपत्तियों और फर्जी लाइसेंस की भी पड़ताल कर रही हैं। अलीनगर व मुगलसराय क्षेत्र में लगातार मिल रही खेप ने स्थानीय स्तर पर पुलिस की निगरानी पर भी सवाल खड़े किए हैं। अब चुनौती केवल बरामदगी तक सीमित नहीं है।
पुलिस को यह पता लगाना होगा कि खेप कहां से आती है, किस गोदाम में रुकती है, किस रास्ते से आगे भेजी जाती है और इसके पीछे असली संचालक कौन हैं। छोटे कैरियरों की गिरफ्तारी से आगे बढ़कर नेटवर्क के सरगनाओं तक पहुंचना ही इस ‘कफ सिरप सिंडिकेट’ की कमर तोड़ने का रास्ता है।