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    जलेसर बड़े मियां-छोटे मियां दरगाह की जात: एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद, मेला में ड्रोन से निगरानी

    Updated: Sat, 04 Jul 2026 02:28 PM (GMT+05:30)

    जलेसर की छोटे मियां-बड़े मियां दरगाह पर आषाढ़ मास की विशेष शनिचर जात आज से शुरू हो रही है, जिसमें एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। ...और पढ़ें

    फाइल फोटो।

    फाइल फोटो।

    HighLights

    1. आज से जलेसर दरगाह में शनिचर जात का शुभारंभ।

    2. एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना।

    3. सुरक्षा हेतु ड्रोन निगरानी, अतिक्रमण हटाकर व्यवस्था मजबूत।

    संवाद सहयोगी, जलेसर (एटा)। नगर स्थित छोटे मियां-बड़े मियां दरगाह पर आषाढ़ मास की विशेष शनिचर की जात आज से शुरू होगी। मेले में एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए पुलिस और प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा एवं यातायात व्यवस्था लागू की है। जात मार्ग से अतिक्रमण हटवा दिया गया है तथा पूरे मेला क्षेत्र की निगरानी ड्रोन कैमरों से की जाएगी।

    उप जिलाधिकारी पीयूष रावत, क्षेत्राधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह रावत और कोतवाली प्रभारी संजय सिंह राघव सुरक्षा व्यवस्था की लगातार निगरानी कर रहे हैं। जनपद के विभिन्न थानों से अतिरिक्त पुलिस बल भी तैनात किया गया है। नगर के प्रवेश मार्गों पर बैरिकेडिंग कर बड़े वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाई गई है।

    मेला की ड्रोन कैमरों से की जाएगी निगरानी, मजबूत होगी सुरक्षा व्यवस्था

    वहीं शुक्रवार दोपहर 12 बजे से शनिवार दोपहर दो बजे तक नगर में ई-रिक्शा संचालन पर प्रतिबंध लगाया गया है, ताकि श्रद्धालुओं की आवाजाही सुचारु बनी रहे। आषाढ़ मास की शनिचर जात का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। दो दिन पहले से ही हजारों श्रद्धालु नगर और मेला क्षेत्र में पहुंचने लगे हैं तथा शुक्रवार रात से श्रद्धालुओं की संख्या में और अधिक वृद्धि होने की संभावना है।

    श्रद्धालुओं का मानना है कि इस अवसर पर दर्शन-पूजन और मनौती मांगने से उनकी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। कई परिवार अपने बच्चों का मुंडन संस्कार भी कराते हैं तथा पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराते हैं।

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    दरगाह के इतिहास को लेकर स्थानीय स्तर पर विभिन्न मान्यताएं प्रचलित

    दरगाह के इतिहास को लेकर स्थानीय स्तर पर विभिन्न मान्यताएं प्रचलित हैं। कुछ लोग दावा करते हैं कि मुगल काल से पहले यहां भगवान शनिदेव का मंदिर था, जिसे बाद में दरगाह का स्वरूप दिया गया। वहीं परिसर में नारियल और कौड़ी चढ़ाने की परंपरा भी आज तक जारी है।

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    हालांकि, इन ऐतिहासिक दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इस स्थल से संबंधित स्वामित्व और अन्य विवाद न्यायालय में विचाराधीन हैं तथा वर्तमान में परिसर प्रशासन के नियंत्रण में है।

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