ट्यूबवेल कनेक्शन पर किसानों को बड़ी राहत, अब स्टोर में सामान नहीं तो एस्टीमेट में नहीं जुड़ेगी कीमत
ऊर्जा निगम ने निजी नलकूप बिजली कनेक्शन लेने वाले किसानों के लिए नई व्यवस्था लागू की है, जिससे उन्हें निर्माण सामग्री के नाम पर होने वाली दोहरी आर्थिक ...और पढ़ें
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सांकेतिक तस्वीर। सौजन्य- ai generated
HighLights
किसानों को नलकूप कनेक्शन सामग्री में दोहरी मार से राहत।
स्टोर में अनुपलब्ध सामग्री किसान स्वयं खरीद सकेंगे।
सामग्री का मूल्य एस्टीमेट में अब नहीं जुड़ेगा।
जागरण संवाददाता, गाजियाबाद। निजी नलकूप (ट्यूबवेल) बिजली कनेक्शन लेने वाले किसानों को अब निर्माण सामग्री के नाम पर पड़ने वाली दोहरी आर्थिक मार से राहत मिलेगी। ऊर्जा निगम ने नई व्यवस्था लागू की है।
पहले उपभोक्ता से एस्टीमेट में सामग्री का पैसा लिया जाता था, लेकिन स्टोर में सामान उपलब्ध नहीं होने पर वही सामग्री बाजार से भी खरीदनी पड़ती थी। अब ऐसी सामग्री का मूल्य एस्टीमेट में शामिल नहीं किया जाएगा और किसान उसे स्वयं खरीद सकेंगे।
नई व्यवस्था में क्या होगा खास?
नई व्यवस्था के तहत लागत प्राक्कलन (एस्टीमेट) में जिन सामग्रियों की उपलब्धता स्टोर पर नहीं होगी, उनका नाम, मात्रा और अनुमानित कीमत तो दर्ज रहेगी, लेकिन उसका मूल्य कुल एस्टीमेट में नहीं जोड़ा जाएगा।
आवेदक अधिकृत लाइन निर्माण एजेंसी के माध्यम से या स्वयं बाजार से सामग्री खरीद सकेंगे। इसमें मुख्य रूप से सीमेंट के पोल, स्टे सेट, स्टे वायर, अर्थिंग सेट, जीआइ वायर, क्रास आर्म, इंसुलेटर, चैनल, क्लैंप, नट-बोल्ट और लाइन निर्माण में उपयोग होने वाली अन्य निर्माण सामग्री शामिल है।
उपभोक्ता द्वारा खरीदी गई सामग्री की गुणवत्ता और तकनीकी मानकों की जांच ऊर्जा निगम करेगा। पोल लगाने, स्टे, अर्थिंग और लाइन निर्माण का कार्य निर्धारित मानकों के अनुसार ही कराया जाएगा। ऊर्जा निगम प्रत्येक आवेदक को लागत एस्टीमेट के साथ नियम एवं शर्तों की प्रति भी उपलब्ध कराएगा, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहे।
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जिले में इस समय करीब 25 से 30 निजी नलकूप बिजली कनेक्शन विभिन्न चरणों में लंबित हैं। जिले में कुल लगभग 10 हजार निजी नलकूप कनेक्शन हैं, जिनमें करीब 9,400 ग्रामीण और 600 शहरी क्षेत्र के उपभोक्ता शामिल हैं। नई व्यवस्था से लंबित कनेक्शनों को जारी करने में तेजी आने की उम्मीद है।
पहले कई मामलों में स्टोर में सामग्री उपलब्ध नहीं होने के बावजूद उसकी राशि उपभोक्ता से एस्टीमेट में जमा हो जाती थी। बाद में वही सामग्री बाहर से खरीदनी पड़ती थी, जिससे किसानों पर दोहरी आर्थिक मार पड़ती थी। नई व्यवस्था में ऐसी सामग्री का मूल्य एस्टीमेट में शामिल नहीं होगा, इसलिए उपभोक्ता को एक ही सामग्री का दोबारा भुगतान नहीं करना पड़ेगा।
- नरेश कुमार भारती, मुख्य अभियंता, जोन-द्वितीय