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    हरीश राणा की गरिमापूर्ण विदाई होगी एम्स के पैलिएटिव केयर में, परिवार को रह-रहकर याद आ रही हर बीती बात

    Updated: Fri, 13 Mar 2026 10:12 PM (IST)

    सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली एम्स को हरीश राणा को पैलिएटिव केयर में भर्ती कर जीवनरक्षक उपकरण हटाने का निर्देश दिया है। यह प्रक्रिया चिकित्सा विशेषज्ञों की ...और पढ़ें

    HighLights

    1. सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के लिए पैलिएटिव केयर का निर्देश दिया।

    2. एम्स में चिकित्सा विशेषज्ञों की निगरानी में जीवनरक्षक उपकरण हटेंगे।

    3. यह मामला मानवीय गरिमा और चिकित्सा नैतिकता के प्रश्न उठाता है।

    शाहनवाज अली, गाजियाबाद। कोमा में गहरी नींद सो रहे हरीश राणा जैसे संवेदनशील और ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को निर्देश दिया है कि हरीश राणा को पैलिएटिव केयर में भर्ती कर चिकित्सा विशेषज्ञों की निगरानी में जीवनरक्षक उपकरण हटाने की प्रक्रिया पूरी की जाए। परिवार के लोग हरीश की गरिमापूर्ण विदाई को लेकर भावुक हैं और दिल्ली एम्स की चिकित्सीय टीम के इंतजार में हैं।

    आगे की चिकित्सकीय प्रक्रिया शुरू होगी

    बता दें कि पैलिएटिव केयर का उद्देश्य असाध्य रोगों से पीड़ित मरीजों को तब आराम, सम्मान और गरिमा प्रदान करना होता है, जब उपचार की संभावनाएं समाप्त हो चुकी हों। अदालत के निर्देशों के अनुपालन में बृहस्पतिवार को एम्स की विशेषज्ञ टीम के आने की उम्मीद थी, लेकिन वह नहीं आ सकी। शुक्रवार को टीम के पहुंचने की संभावना जताई जा रही है, जिसके बाद आगे की चिकित्सकीय प्रक्रिया शुरू होगी।

    चिकित्सा नैतिकता से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न

    सुप्रीम कोर्ट में इस केस के अधिवक्ता मनीष जैन के अनुसार निर्णय का उद्देश्य लंबे समय से पीड़ा झेल रहे मरीज को अनावश्यक कष्ट से मुक्ति दिलाना है। चिकित्सकों ने भी स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया मेडिकल प्रोटोकॉल और कानूनी दिशा-निर्देशों के अनुरूप, बहु विषयक विशेषज्ञों की देखरेख में की जाएगी। मामले पर देशभर की निगाहें टिकी हैं, क्योंकि यह मानवीय गरिमा और चिकित्सा नैतिकता से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को रेखांकित करता है।

    सिविल इंजीनियर बने देखने का अधूरा सपना

    हरीश राणा की कहानी सिर्फ एक हादसे की नहीं, बल्कि संघर्ष, सपनों और अचानक टूट गई उम्मीदों की मार्मिक दास्तान है। वर्ष 2013 में हरीश बीटेक (सिविल इंजीनियरिंग) के फाइनल ईयर का छात्र था। पढ़ाई के साथ-साथ वह वेटलिफ्टिंग का बेहतरीन खिलाड़ी भी था।

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    इस हादसे से पहले वह दो कंपीटिशन जीत चुका और अगले की तैयारी में था। उसका सपना सिविल इंजीनियरिंग के साथ वेट लिफ्टिंग में चैंपियन बनने का भी था, जिसे उनके पिता अशोक राणा पूरा होते देखना चाहते थे।

    वर्ष 2013 के रक्षाबंधन की वह शाम आज भी परिवार के दिलों में टीस बनकर दर्ज है। हरीश ने खुशी-खुशी अपनी बहन से बात की और वही दिन जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी में बदल गया। परिवार को खबर मिली थी कि हरीश चंडीगढ़ के एक पेइंग गेस्ट हाउस की चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गया है।

    अगले दिन ही बनना था वेटलिफ्टिंग चैंपियन

    यह विडंबना थी कि अगले ही दिन हरीश को वेटलिफ्टिंग के फाइनल मुकाबले में जीतकर चैंपियन बनना था। मंच, मेडल और तालियों की जगह हरीश अस्पताल के बिस्तर पर पहुंच चुका था। शरीर ने भारी वजन उठाकर जीत की मिसाल की जगह जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष जारी है। परिवार के लिए यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सपनों के टूटने की पीड़ा है।

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