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    दुष्कर्म पीड़िता को 9 घंटे तक नहीं मिला इलाज, गाजीपुर मेडिकल कॉलेज की दो महिला डॉक्टर जिम्मेदार

    Updated: Wed, 03 Jun 2026 12:33 PM (IST)

    गाजीपुर में छह साल की दुष्कर्म पीड़िता को नौ घंटे तक इलाज न मिलने के मामले में सीएमओ की जांच में दो महिला डॉक्टरों, प्रीति पाल और गीतिका को जिम्मेदार ...और पढ़ें

    प्रतीकात्मक तस्वीर।

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    जागरण संवाददाता, गाजीपुर। छह साल की दुष्कर्म पीड़िता बच्ची को कई घंटे तक राजकीय मेडिकल कालेज के अस्पताल में उपचार न मिलने के प्रकरण की सीएमओ की जांच में दो महिला डॉक्टर प्रीति पाल और डॉ. गीतिका को जिम्मेदार ठहराया गया है।

    सीएमओ ने इन दोनों डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की है,ताकि इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति न हो। जिलाधिकारी ने स्वास्थ्य विभाग और पुलिस विभाग की रिपोर्ट को राज्य मानवाधिकार आयोग को जांच रिपोर्ट भेजी है।

    नंदगंज क्षेत्र के गांव में 26 मार्च को पड़ोस के किशोर ने छह वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म किया था। बच्ची खून से लथपथ हालत में रोते हुए घर पहुंची और पूरी बात बताई। उसे राजकीय मेडिकल कालेज के महिला अस्पताल ले जाया गया।

    पिता का आरोप था कि बच्ची को लगातार रक्तस्राव हो रहा था, लेकिन चिकित्सकों ने इलाज शुरू करने के बजाय एफआइआर दर्ज कराने के लिए थाने भेज दिया। बगल स्थित कोतवाली पहुंचे, लेकिन मामला नंदगंज थाना का होने के कारण उन्हें शहर कोतवाली से 25 किमी दूर नंदगंज थाने भेज दिया गया।

    वहां पूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी होने में करीब पांच से छह घंटे लग गए। रात करीब आठ बजे जब माता-पिता एफआइआर की प्रति लेकर दोबारा महिला अस्पताल पहुंचे तो चिकित्सकों ने मेडिकल परीक्षण का हवाला देते हुए राजकीय मेडिकल कालेज के अस्पताल परिसर में स्थित ट्रामा सेंटर भेज दिया।

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    करीब तीन किलोमीटर दूर ट्रामा सेंटर पहुंचने पर वहां चिकित्सक उपलब्ध नहीं होने का हवाला देकर उन्हें फिर महिला अस्पताल लौटा दिया गया। स्वजन आक्रोशित हो गए और अस्पताल में ही धरने पर बैठकर हंगामा करने लगे थे। एएसपी ग्रामीण अतुल सोनकर, एसडीएम सदर रवीश गुप्ता, सीएमओ डॉ. सुनील पांडेय, राजकीय मेडिकल कालेज के उप प्रधानाचार्य डॉ. नीरज पांडेय ने पहुंचकर बच्ची को जिला महिला अस्पताल में भर्ती कराया। रात करीब 11 बजे उसका उपचार शुरू हो सका था।

    दुष्कर्म पीड़िता की इलाज में हुई लापरवाही के बाद राजकीय मेडिकल कालेज अस्पताल की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होने लगे। मामला तूल पकड़ते ही सीएमओ व मेडिकल कालेज के प्राचार्य एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने लगे थे। इस मामले में तत्कालीन डीएम ने सीएमओ से रिपोर्ट मांगी थी।

    उधर, प्रकरण मानवाधिकार आयोग व राज्य महिला आयोग तक भी पहुंचा था। मानवाधिकार आयोग ने डीएम से रिपोर्ट मांगी थी। डीएम ने आयोग को सीएमओ व एसपी की जांच रिपोर्ट भेज दी है। जांच रिपोर्ट में सीएमओ ने कहा है कि घटना की जानकारी पर महिला अस्पताल पहुंचा तो महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रीति पाल व डॉ. गीतिका ड्यूटी पर थी।

    उन्होंने बताया कि बच्ची को बुखार की गोली दे दी है। पेशाब के रास्ते रक्तसाव न हो इसकी व्यवस्था कर दी है। बच्ची का पूर्ण उपचार न करने के सवाल पर दोनों डॉक्टरों का कहना था कि यह बच्ची है, इसे बच्चों के चिकित्सक देखेंगे। उन्हें बच्चों का उपचार करना नहीं आता है।

    घटनाक्रम में समय मेडिकल कालेज के उपप्रधानाचार्य डॉ. नीरज पांडेय ने बताया कि यहां पर बच्चों के डॉक्टर नहीं है, और ना ही इन महिला चिकित्सा अधिकारियों को मेडिकोलीगल का ज्ञान है। इस पर सीएमओ ने टिप्पणी की है कि प्रत्येक चिकित्सक को एमबीबीएस के दौरान मेडिकोलीगल से संबंधित फॉरेन्सिक मेडिसिन की ट्रेनिंग दी जाती है। सरकार से प्रशिक्षण कराया जाता है।

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