गोरखपुर रामगढ़ताल हादसा: घटनाएं देती रहीं चेतावनी, अनसुनी करते रहे जिम्मेदार
गोरखपुर के रामगढ़ताल में हुई मोटरबोट दुर्घटना अधिकारियों की लापरवाही और चेतावनियों की अनदेखी का परिणाम है, जिसमें एक व्यक्ति की मौत और नौ घायल हुए। दै ...और पढ़ें

14 जून और 5 जुलाई को दैनिक जागरण ने उजागर की थीं सुरक्षा इंतजामों की खामियां, जिम्मेदारों ने नहीं लिया सबक। जागरण
HighLights
रामगढ़ताल में मोटरबोट दुर्घटना, एक की मौत, नौ घायल हुए।
अधिकारियों ने सुरक्षा चेतावनियों और नियमों की अनदेखी की।
ताल में एसडीआरएफ, जल पुलिस, प्रशिक्षित गोताखोरों का अभाव।
अरुण चन्द, गोरखपुर। रामगढ़ताल में रविवार को हुई मोटरबोट दुर्घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही और चेतावनियों की लगातार अनदेखी का नतीजा है। प्लेटफार्म नंबर चार से निकली मोटरबोट जेटी से कुछ ही दूरी पर प्लेटफार्म नंबर पांच की स्लोबोट से टकरा गई। हादसे में एक व्यक्ति को जान से हाथ धोना पड़ा, तो नौ लोग घायल हो गए। घटना के पीछे सुरक्षा व्यवस्था की जो खामियां अहम कारण हैं, उनको दैनिक जागरण डेढ़ महीने से लगातार उजागर करता रहा है।
दैनिक जागरण ने 14 जून को प्रमुखता से प्रकाशित रिपोर्ट में रामगढ़ताल की सुरक्षा व्यवस्था की भौतिक हकीकत बयां की थी। उस रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया था कि करीब 1700 एकड़ में फैले ताल में न तो एसडीआरएफ या जल पुलिस की स्थायी तैनाती है, न प्रशिक्षित गोताखोरों की पर्याप्त व्यवस्था।
स्पीड मोटरबोटों पर स्टंट, तेज रफ्तार, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और रेस्क्यू सिस्टम की कमी जैसे गंभीर मुद्दों को विस्तार से सामने लाया गया था। रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से बताया गया था कि केवल लाइफ जैकेट पर्याप्त नहीं, बल्कि बड़े जलाशय में प्रशिक्षित चालक, त्वरित बचाव दल और आपातकालीन संचार व्यवस्था भी अनिवार्य है।
इसके बावजूद जिम्मेदार विभागों ने इन चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया। हालात यह रहे कि 12 जून को छात्रा की डूबने से मौत के बाद भी सुरक्षा व्यवस्था में कोई ठोस बदलाव दिखाई नहीं दिया। इसके बाद दैनिक जागरण ने पांच जुलाई को दूसरी विस्तृत रिपोर्ट दैनिक जागरण डिजिटल पर प्रकाशित कर फिर सवाल उठाया कि शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद रामगढ़ताल में सूर्यास्त के बाद भी मोटरबोटों का संचालन जारी है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया था कि कई चालकों के पास आवश्यक लाइसेंस और प्रशिक्षण प्रमाणपत्र तक नहीं हैं तथा कई बार सुरक्षा नियमों का खुलेआम उल्लंघन होता है।
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रविवार का हादसा उन आशंकाओं को सच साबित कर गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जेटी से निकलते ही प्लेटफार्म नंबर चार की मोटरबोट सामने से आ रही प्लेटफार्म नंबर पांच की स्लोबोट से टकरा गई। इस बोट में कोई लाइट नहीं जल रही थी। हादसे के बाद राहत और बचाव के लिए तत्काल कोई समर्पित रेस्क्यू यूनिट मौजूद नहीं थी। शुरुआती मदद आसपास में मौजूद लोगों और अन्य नाव चालकों के भरोसे ही हुई।
हैरानी की बात यह है कि इससे पहले भी रामगढ़ताल कई दुर्घटनाओं का गवाह बन चुका है। वर्ष 2025 में दो मोटरबोटों की टक्कर में कई लोग घायल हुए थे। एक अन्य मोटरबोट फ्लोटिंग रेस्तरां के पिलर से टकरा चुकी है। हर हादसे के बाद जांच और सख्ती के दावे किए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
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जबलपुर के बरगी बांध में क्रूज पलटने की घटना के बाद शासन ने सभी जिलों को नौका सुरक्षा के संबंध में सख्त निर्देश जारी किए थे। जिला प्रशासन ने भी लाइसेंसधारी चालकों से ही संचालन, क्षमता से अधिक सवारी न बैठाने, प्रत्येक यात्री को लाइफ जैकेट पहनाने, सूर्यास्त के बाद बोटिंग पूरी तरह बंद कराने तथा घाटों पर गोताखोर, लाइफबाय, सर्च लाइट और प्राथमिक उपचार किट उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे, लेकिन रामगढ़ताल में इन निर्देशों का पालन कितना हुआ, रविवार की घटना ने उसकी वास्तविक तस्वीर सामने रख दी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हर चेतावनी और हर रिपोर्ट के बाद भी व्यवस्था किसी बड़े हादसे का इंतजार करती रहेगी? आखिर कब रामगढ़ताल में स्थायी जल पुलिस चौकी, एसडीआरएफ की तैनाती, प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम, लाइसेंसधारी चालक और सख्त निगरानी की व्यवस्था लागू होगी?
यदि 14 जून और 5 जुलाई को उठाए गए सवालों पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई की गई होती, तो संभव है कि रविवार का यह हादसा टाला जा सकता था। अब जिम्मेदारों के सामने केवल कार्रवाई का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का भी सवाल खड़ा हो गया है।