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    गोरखपुर RMRC का बड़ा दावा, 2027 तक भारत से मलेरिया हो सकता है खत्म

    Updated: Fri, 03 Apr 2026 10:51 AM (GMT+05:30)

    गोरखपुर के क्षेत्रीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान केंद्र (RMRC) के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि भारत 2027 तक मलेरिया मुक्त हो सकता है। सोनभद्र जिले को एक स ...और पढ़ें

    आरएमआरसी गोरखपुर। जागरण

    आरएमआरसी गोरखपुर। जागरण

    HighLights

    1. RMRC ने 2027 तक मलेरिया उन्मूलन का दावा किया।

    2. सोनभद्र में 95% मलेरिया मामलों में कमी आई।

    3. हॉटस्पॉट पहचान और बिना लक्षण वाले मरीजों पर ध्यान।

    गजाधर द्विवेदी, गोरखपुर। क्षेत्रीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान केंद्र (आरएमआरसी) के विज्ञानियों ने अपने ताजा अध्ययन में दावा किया है कि भारत से वर्ष 2027 तक मलेरिया का पूरी तरह उन्मूलन संभव है। इसके लिए उन्होंने ने सोनभद्र जिले को एक माडल के रूप में प्रस्तुत किया है, जहां कभी मलेरिया के सर्वाधिक मामले सामने आते थे।

    वर्ष 2017 में सोनभद्र में मलेरिया के 6034 मरीज दर्ज किए गए थे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आरएमआरसी ने एक विशेष रणनीति तैयार की और मलेरिया उन्मूलन के लिए जमीनी स्तर पर काम शुरू किया। विज्ञानियों ने उन इलाकों की पहचान की, जहां सबसे अधिक मामले सामने आ रहे थे। वहां स्रोतों को ढूंढकर नष्ट किया गया। साथ ही वहां जांच व उपचार विशेष ध्यान दिया गया।

    2024 तक यह संख्या घटकर 270 पर आ गई। अपने द्वारा तैयार नीतियों की वजह से मलेरिया पीड़ितों में लगभग 95 प्रतिशत की गिरावट से उत्साहित विज्ञानियों ने इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च के माध्यम से केंद्र सरकार को मलेरिया उन्मूलन की कार्ययोजना बनाकर भेजा है। इस अध्ययन को अमेरिका के जर्नल एक्टाट्रापिका में 21 मार्च को प्रकाशित कर इस अध्ययन पर अंतरराष्ट्रीय मान्यता की मुहर लगा दी है।

    इस पूरी प्रक्रिया में आधुनिक तकनीकों का भी सहारा लिया गया। जीयोग्राफिकल इंफॉर्मेशन सिस्टम के माध्यम से मलेरिया के हाटस्पाट क्षेत्रों को चिह्नित किया गया। इसमें इसरो के पोर्टल 'भुवन' का भी उपयोग किया गया। इन क्षेत्रों में समूह स्तर पर सैंपलिंग कर वास्तविक स्थिति का आकलन किया गया। जांच के दौरान एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि कई मरीज बिना लक्षण वाले (एसिम्प्टोमेटिक) थे।

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    चूंकि इन मरीजों में बीमारी के स्पष्ट लक्षण नहीं थे, इसलिए वे इलाज नहीं कराते थे और अनजाने में संक्रमण को फैलाते रहते थे। विज्ञानियों ने इस पहलू को गंभीरता से लेते हुए ऐसे मामलों की पहचान और उपचार पर विशेष जोर दिया। इसके साथ ही व्यापक जागरूकता अभियान चलाए गए, ताकि लोग समय पर जांच और उपचार करा सकें। अध्ययन में डा. हरिशंकर जोशी, डा. गौरवराज द्विवेदी, डा. बृजरंजन मिश्रा, शशिकांत तिवारी, धर्मेंद्र श्रीवास्तव, डा. नलिनी मिश्रा शामिल थीं।

    ऐसे किया गया काम-मलेरिया का पहला मरीज जहां मिला था, वहां जांच की गई और मच्छरों के पनपने के स्रोत नष्ट किए गए

    • जहां सबसे ज्यादा मरीज मिले थे, उस स्थान को अक्षांश-देशांतर पर देखकर वहां की भौगोलिक स्थिति जानी गई
    • जीओग्राफिकल इन्फार्मेशन सिस्टम का उपयोग कर हाटस्पाट चिह्नित किए गए
    • जांच व दवाओं का वितरण सब जगह समान होता था, हास्टस्पाट वाले क्षेत्रों में इसे बढ़ाया गया
    • लोगों को इस बीमारी व मच्छरों से बचाव के लिए जागरूक किया गया

    सोनभद्र जैसे दुर्गम और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में माइक्रो लेवल पर अपनाई गई यह रणनीति पूरे देश के लिए उदाहरण बन सकती है। यदि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और समुदाय मिलकर इसी तरह समन्वित प्रयास करें, तो भारत को मलेरिया मुक्त बनाने का सपना 2027 तक साकार हो सकता है।

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    -डा. हरिशंकर जोशी, निदेशक आरएमआरसी

    सोनभद्र में चोपन सबसे बड़ा हाटस्पाट क्षेत्र था। वहां मलेरिया के उच्च जोखिम वाले कलस्टर पाए गए। आधुनिक तकनीको से हाईरिस्क क्षेत्रों की पहचान की गई। माइक्रो लेवल पर जाकर विश्लेषण से हम जहां सबसे ज्यादा जरूरी था, वहां बेहतर संसाधनों का उपयोग कर सके। इससे 95 प्रतिशत गिरावट आई।

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    -डा. गौरवराज द्विवेदी, वायरोलाजिस्ट आरएमआरसी