गोरखपुर सबरंग: इतिहास, संस्कृति और अध्यात्म का संसार बौद्ध संग्रहालय
गोरखपुर का राजकीय बौद्ध संग्रहालय रामगढ़ताल किनारे स्थित एक जीवंत सांस्कृतिक केंद्र है। यह विभिन्न वीथिकाओं के माध्यम से प्राचीन इतिहास, कला और अध्यात ...और पढ़ें

राजकीय बौद्ध संग्रहालय के जैन वीथिका में रखी गई प्राचीन मूर्तियां। जागरण
HighLights
विभिन्न वीथिकाओं में प्राचीन कला और इतिहास का प्रदर्शन।
बुद्ध धम्म, राहुल सांकृत्यायन और जैन कला का संगम।
आगंतुकों को ज्ञान और आध्यात्मिक शांति का अनुभव।
अरुण कुमार मुन्ना, गोरखपुर। रामगढ़ताल की शांत लहरों के किनारे जैसे ही राजकीय बौद्ध संग्रहालय की भव्य इमारत सामने आती है, ऐसा महसूस होता है मानो इतिहास स्वयं अपने द्वार खोलकर आगंतुकों का स्वागत कर रहा हो। आधुनिक स्थापत्य और प्राचीन विरासत के अद्भुत संगम से सजा यह संग्रहालय अब केवल पुरावशेषों का केंद्र नहीं, बल्कि अतीत को सजीव अनुभव कराने वाला सांस्कृतिक संसार बन चुका है, जहां हर वीथिका हजारों वर्षों की सभ्यता की कहानी सुनाती है। प्रस्तुत है अरुण मुन्ना की रिपोर्ट:
नौकायन से चिड़ियाघर की ओर जाने वाले पर फोरलेन किनारे संग्रहालय स्थापित है। इसके मुख्य प्रवेश द्वार पर पहुंचते ही वातावरण बदलने लगता है। लगभग 50 कदम आगे जाकर दाहिनी ओर मुड़ने पर वीथिका बनी है। भूतल पर विविध कार्यक्रमों के आयोजन के लिए हाल तो प्रथम तल पर संग्रहालय वीथिका हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता, संस्कृति और विरासत को समेटे हुए मुस्कुरा रही है।
बाईं ओर टिकट खिड़की है। उसके भीतर ही सामान सुरक्षित रखने की व्यवस्था आधुनिकता का एहसास कराती है। 30 जून तक संग्रहालय भ्रमण पर्यटकों के लिए निश्शुल्क है। यहां कांच का स्वचालित द्वार जैसे ही खुलता है, भीतर से आती बुद्धं शरणं गच्छामि की मधुर ध्वनि मन को अद्भुत शांति से भर देती है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई साधक ध्यान की यात्रा पर निकल पड़ा हो।
भीतर प्रवेश करते ही सामने बुद्ध धम्म वीथिका है। विशाल वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न भगवान बुद्ध की प्रतिमा पूरे वातावरण को आध्यात्मिक आभा से आलोकित कर रही है। दीवारों पर गौतम बुद्ध के जन्म से महापरिनिर्वाण तक की यात्रा अत्यंत रोचक शैली में उकेरी गई है। प्रमुख बौद्ध विद्वानों, उनकी रचनाओं और बौद्ध दर्शन की व्याख्याएं आगंतुकों को इतिहास के अत्यंत निकट ले जाती हैं।

राजकीय बौद्ध संग्रहालय के जैन वीथिका में रखी गई प्राचीन मूर्तियां। जागरण
बेलवार से आए राजू और शिवम ध्यानमग्न होकर चित्रकलाओं को देख रहे हैं। राजू कहते हैं कि यह स्थान तो वाकई ज्ञान के भंडार से भरा है। शिवम बताते हैं कि पहली बार आए हैं, लेकिन जब दोबारा आएंगे तो स्वजन और रिश्तदारों को संग लेकर आए। वह कहते हैं कि शहर में यह अद्भुत संग्रहालय हैं, जहां हमारी विरासत सहेजी गई है। इस पर हर किसी को गर्व करना चाहिए।
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महापंडित राहुल सांकृत्यायन को समर्पित राहुल सांकृत्यायन बौद्ध कला वीथिका जाते ही प्राचीन भारत की कला जीवंत हो उठती है। यहां मथुरा शैली के गुप्तकालीन बुद्ध शीर्ष, गांधार शैली के बोधिसत्व और मार का आक्रमण से जुड़े दुर्लभ फलक मंत्रमुग्ध करते हैं। पालकालीन बौद्ध स्तूपों और तांत्रिक प्रतिमाओं को देखकर ऐसा लगता है, मानों पूर्वांचल की धरती फिर से बौद्ध संस्कृति के स्वर्णिम काल में लौट आई हो।

राजकीय बौद्ध संग्रहालय में बनाया गया बुद्ध धम्म विथिका। जागरण
इस वीथिका में राहुल सांकृत्यायन के चित्र संग उनके जीवन वृत से लेकर उनकी पुस्तक वोल्गा से गंगा, दिमागी गुलामी और राहुल सांकृत्यायन और बौद्ध धर्म का प्रारूप प्रदर्शित है। साथ ही उनके उपन्यास, कथा साहित्य, नाटक, जीवनियां, यात्रा वृतांत, निबंध, धर्म और दर्शन व इतिहास की जानकारी उपलब्ध है।
इसके भीतर से ही पुरातत्व वीथिका में प्रवेशद्वार है, जहां हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता आंखों के सामने साकार हो रही है। पाषाण कालीन हथियार, मिट्टी की मूर्तियां, प्राचीन सिक्के और आभूषण उस युग की जीवन शैली का जीवंत चित्र प्रस्तुत कर रहे हैं। हारिति की मृण्मूर्ति, शुकसारिका, पशु आकृतियां और कुषाणकालीन सिक्कों के सांचे विशेष रूप से आकर्षित कर रहे हैं।
ऐसा प्रतीत होता है जैसे प्राचीन मानव की सांसें अब भी इन कलाकृतियों में बसती हों। प्रस्तर मूर्तियां अपनी भव्यता से चकित करती है। अष्टभुजी नृत्यमुद्रा में गणेश, त्रिशूलधारी शिव, शेषशायी विष्णु और नवग्रह पट्ट भारतीय शिल्पकला की अद्भुत परंपरा का परिचय देते हैं। कसौटी पत्थर पर बनी पाल शैली की उमा-महेश्वर प्रतिमा तो मानो कला और भक्ति का दिव्य संगम प्रतीत हैं।
इस वीथिका में जिज्ञासा शांत करने में एक घंटे कब व्यतीत हो जाते हैं। इसका आभास नहीं होता है। तब ध्यान आता है कि अभी तो अन्य वीथिकाओं का अवलोकन बाकी है।
चित्रकला वीथिका में पहुंचते ही रंगों की दुनिया जीवंत हो उठती है।
कोहबर और सांझी की आकृतियाें के रंग अपनी ओर खींचते हैं। राजस्थानी और पहाड़ी शैली के लघुचित्रों में राधा-कृष्ण की रासलीला, माखनचोर कृष्ण, महिषासुर मर्दिनी और पंचतंत्र की कथाएं इतनी बारीकी से उकेरी गई हैं कि हर कोई देर तक उन्हें निहारता रहे। तिब्बती और नेपाली थंका चित्र आध्यात्मिक कला की दुर्लभ झलक प्रस्तुत करते हैं।

राजकीय बौद्ध संग्रहालय के जैन वीथिका में रखी गई प्राचीन मूर्तियां। जागरण
इसी से जुड़ा बाल संग्रहालय गतिविधि क्षेत्र बच्चों के लिए ज्ञान और मनोरंजन का अनूठा संसार है। इसमें बुद्ध की बाल कालीन चित्र उनके बचपन का बोध कराते हैं। इस होकर आगे बढ़ने पर मानव विकास बाल वीथिका अद्भुत बनी है। यहां मानव विकास की कहानी अत्यंत रोचक ढंग से दिखती है।
स्वचालित मूर्तियों में शिकार से लेकर आग की खोज, पहिए के आविष्कार, सिक्कों का प्रचलन, कृषि का आरंभ, अभिलेखों का अंकन, सैन्धव सभ्यता और मूर्तिकला कला का विकास, अजंता एलोरा,स्थापत्य कला, महाकाव्यों की रचना, जैन तीर्थकर, संत कबीर, जलीय जीवन के साथ नगरीय जीवन के दृश्य अवलोकित हैं। यहां सभ्यता, संस्कृति और मनुष्य के विकास की यात्रा बच्चे हों बड़े, सभी के लिए कौतूहल है। गीता प्रेस और गोरखनाथ मंदिर की झलकियां स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को भी सहेज रही हैं।
इससे सटे ही जैन कला वीथिका का क्षेत्र है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की एक और अनमोल धरोहर से परिचित कराती इस वीथिका में जैन पूजा के प्रथम सोपान आयागपट्ट मथुरा से प्राप्त हैं। पत्थर के चौकोर टुकड़ों के ऊपर शुभ चिन्हों का अंकन जैसे शुभ चिन्ह, स्वास्तिक, श्रीवत्स मीन, पूर्णघट, माला, वर्द्धमान आदि अष्टमांगलिक चिन्हों को उकेरा गया है।
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तीर्थंकर प्रतिमाएं, सर्वतोभद्रिका और संवत 54 की लेखयुक्त सरस्वती प्रतिमा की अनुकृति इतिहास और आस्था का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करती है। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि प्रत्येक प्रतिमा अपने समय की कहानी स्वयं सुना रही है।
संग्रहालय का संदर्भ पुस्तकालय शोधार्थियों के लिए ज्ञान का खजाना है। कला, इतिहास, पुरातत्व और प्रतिमा शास्त्र से जुड़ी 1500 से अधिक पुस्तकों का संग्रह विद्यार्थियों और विद्वानों के लिए सुलभ है। संग्रहालय की आधुनिक प्रकाश व्यवस्था कलाकृतियों, दृश्यों और चित्रों को नयनाभिराम बनाती है।
संग्रहालय परिसर भी कम आकर्षक नहीं है। बच्चों के लिए झूले, सुंदर वाटिकाएं और दुर्लभ औषधीय पौधों की हरियाली वातावरण को और मनोहारी बनाती हैं। सिंदूर, कपूर, दालचीनी, तेजपत्ता, चंदन और रुद्राक्ष सहित अनेक दुर्लभ पौधों से सजा परिसर प्रकृति और संस्कृति का अद्भुत मेल है। यहां से निकलने पर ऐसा लगा कि हजारों वर्षों की सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना की अनगिनत स्मृतियां साथ हैं। राजकीय बौद्ध संग्रहालय अब गोरखपुर की पहचान भर नहीं, बल्कि इतिहास को जीवंत अनुभव कराने वाला एक सांस्कृतिक तीर्थ है।
राजकीय बौद्ध संग्रहालय केवल पुरावशेषों को संरक्षित करने का केंद्र नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक जीवंत रूप में पहुंचाने का माध्यम है। यहां आने वाले आगंतुक इतिहास को केवल देखते नहीं, बल्कि उसे महसूस भी करते हैं। आधुनिक डिजिटल तकनीक और प्राचीन धरोहरों के समन्वय से संग्रहालय को इस प्रकार विकसित किया गया है कि शोधार्थियों, विद्यार्थियों और पर्यटकों को ज्ञान के साथ आत्मिक अनुभूति भी प्राप्त हो। हमारा प्रयास है कि यह संग्रहालय पूर्वांचल की सांस्कृतिक पहचान के साथ विश्व बौद्ध धरोहर मानचित्र पर भी अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराए।
-डा. यशवंत सिंह राठौर, उप निदेशक, राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर