हरदोई में अधिकारियों ने 67 स्कूल लिए गोद, बदली तस्वीर... एक पहल ने लिखी शिक्षा की नई इबारत
हरदोई में अधिकारियों और जनसहयोग से 67 जर्जर परिषदीय विद्यालयों को मॉडल स्कूलों में बदला गया है। इस पहल से स्कूलों का कायाकल्प हुआ, बच्चों का नामांकन ब ...और पढ़ें
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उच्च प्राथमिक विद्यालय सदई बेहटा।
HighLights
अधिकारियों ने वेतन से शुरुआत कर 67 स्कूल गोद लिए।
जनसहयोग से जर्जर स्कूल मॉडल बने, नामांकन में वृद्धि।
यह मॉडल अन्य जिलों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
पंकज मिश्र, हरदोई। सिर्फ सरकारी योजना नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी का एहसास जब जनसहयोग से जुड़ जाए तो बदलाव की तस्वीर कितनी खूबसूरत हो सकती है, इसका उदाहरण उत्तर प्रदेश के हरदोई ने पेश किया है। यहां अधिकारियों ने अपने वेतन से शुरुआत की, समाज ने हाथ बढ़ाया और देखते ही देखते गांवों के 67 जर्जर परिषदीय विद्यालय बच्चों के सपनों के मॉडल स्कूल बन गए। यह अभियान बताता है कि इच्छाशक्ति, नेतृत्व और सामूहिक सहयोग मिल जाए तो शिक्षा की तस्वीर बदलने में देर नहीं लगती।
राजस्थान के झालावाड़ में विद्यालय हादसे के बाद प्रदेश में परिषदीय विद्यालयों की सुरक्षा और आधारभूत सुविधाओं को लेकर नई सोच ने जन्म लिया। मुख्यमंत्री की अपील के बाद हरदोई प्रशासन ने इसे मिशन का रूप दिया।
जिलाधिकारी अनुनय झा ने सबसे पहले टड़ियावां ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय कंथाथोक को गोद लेकर संदेश दिया कि बदलाव की शुरुआत स्वयं से होती है। इसके बाद मुख्य विकास अधिकारी, अपर जिलाधिकारी, सभी जिला स्तरीय अधिकारी, खंड विकास अधिकारी तथा नगर पालिका और नगर पंचायतों के अधिशासी अधिकारियों ने एक-एक जर्जर विद्यालय की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली। शुरुआत आसान नहीं थी। कई विद्यालय वर्षों की उपेक्षा झेल चुके थे।

अधिकारियों ने अपने वेतन से अभियान का श्रीगणेश किया और फिर अपने-अपने विभागों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों, ग्राम पंचायतों, क्षेत्र पंचायतों, स्थानीय निकायों और समाजसेवियों से सहयोग जुटाया। प्रत्येक विद्यालय पर लगभग 5 से 10 लाख रुपये तक खर्च कर उसे नए स्वरूप में विकसित किया गया। कुछ ही महीनों में इन विद्यालयों की पहचान बदल गई। जर्जर दीवारों की जगह रंग-बिरंगी शैक्षिक चित्रकारी ने ले ली।
कक्षाओं में आकर्षक फाल सीलिंग, नया फर्नीचर और आधुनिक शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराई गई। बच्चों के लिए झूले लगाए गए, स्वच्छ और सुंदर शौचालय बनाए गए, पेयजल की व्यवस्था सुधारी गई तथा मिड-डे मील के लिए व्यवस्थित शेड और आकर्षक रसोईघर तैयार किए गए। हर कोना बच्चों को विद्यालय आने के लिए प्रेरित करने लगा।
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पूरे अभियान की नियमित समीक्षा होती रही, जिससे गुणवत्ता और समयबद्धता दोनों सुनिश्चित हुईं। 16 जुलाई को उत्सव के बीच एक साथ इन 67 विद्यालयों का लोकार्पण हुआ,तो बदले हुए विद्यालयों को देखकर लोगों ने इसे शिक्षा के क्षेत्र में नई शुरुआत बताया। इस पहल का सबसे बड़ा परिणाम बच्चों की बढ़ती संख्या के रूप में सामने आया।

जिन विद्यालयों में कभी नामांकन घट रहा था, वहीं अब शैक्षिक सत्र 2025-26 में 8,960 से बढ़कर 9,800 बच्चे पहुंच चुके हैं। यह केवल भवनों का कायाकल्प नहीं, बल्कि विश्वास, उम्मीद और भविष्य का पुनर्निर्माण है। हरदोई का यह मॉडल साबित करता है कि जब जिम्मेदारी केवल दायित्व नहीं, बल्कि संकल्प बन जाए, तो सरकारी विद्यालय भी उत्कृष्ट शिक्षा के प्रेरक केंद्र बन सकते हैं।
नए अधिकारियों ने आगे बढ़ाया विद्यालयों के कायाकल्प का संकल्प
इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि अधिकारियों के स्थानांतरण से विद्यालयों के विकास की रफ्तार नहीं थमी। जिस अधिकारी का तबादला हुआ, उसके द्वारा गोद लिया गया विद्यालय स्वतः ही उसके स्थान पर आए नए अधिकारी की जिम्मेदारी बन गया। इससे अभियान में निरंतरता बनी रही और विकास कार्य बिना किसी बाधा के आगे बढ़ते रहे। इसका सबसे अच्छा उदाहरण मुख्य विकास अधिकारी स्तर पर देखने को मिला।

तत्कालीन सीडीओ सान्या छाबड़ा ने बावन विकासखंड के उच्च प्राथमिक विद्यालय भिठारी को गोद लेकर उसके कायाकल्प की शुरुआत कराई। उनके स्थानांतरण के बाद नई मुख्य विकास अधिकारी नेहा ब्याडवाल ने उसी विद्यालय की जिम्मेदारी संभाली और विकास कार्यों को आगे बढ़ाया।
इसी प्रकार जिला पंचायत राज अधिकारी श्रेया उपाध्याय तथा उपायुक्त मनरेगा (श्रम रोजगार) संतोष सिंह ने भी पूर्व अधिकारियों के स्थानांतरण के बाद उनके गोद लिए विद्यालयों की जिम्मेदारी संभालते हुए विकास कार्यों को गति दी। इससे यह संदेश गया कि यह पहल किसी एक अधिकारी की नहीं, बल्कि पूरे प्रशासन की सामूहिक जिम्मेदारी है, जिसमें व्यक्ति बदल सकता है, लेकिन संकल्प और अभियान निरंतर जारी रहता है।
अन्य जिलों और राज्यों के लिए भी प्रेरणा
जिलाधिकारी अनुनय झा का कहना है कि यदि प्रत्येक अधिकारी, संस्था, उद्योग और सक्षम नागरिक अपने क्षेत्र के एक विद्यालय के विकास का संकल्प ले, तो सरकारी स्कूलों की तस्वीर के साथ बच्चों का भविष्य भी बदला जा सकता है। हरदोई में विद्यालयों के कायाकल्प की यह पहल जनभागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मॉडल अन्य जिलों और राज्यों के लिए भी प्रेरणा का माध्यम बन सकता है।

विद्यालय केवल शिक्षा देने की जगह नहीं, बल्कि समाज के भविष्य की नींव होते हैं। यदि हम अपने बच्चों को सुरक्षित, प्रेरक और गुणवत्तापूर्ण वातावरण देना चाहते हैं तो विद्यालयों के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी निभानी होगी। हरदोई में गोद लेने का अभियान इसी सोच का परिणाम है। प्रशासन की टीम के साथ पहल की, तो सभी अधिकारियों ने स्वयं आगे बढ़कर जिम्मेदारी निभाई। अपना विद्यालय सबसे अच्छा करने का प्रयास किया और समाज ने भी पूरा सहयोग दिया। -अनुनय झा, जिलाधिकारी।
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