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    हाथरस में बसपा की नई अग्निपरीक्षा: बदले समीकरण के बीच वापसी की कठिन राह, रामवीर के बाद नेतृत्व का संकट

    Updated: Mon, 06 Jul 2026 02:35 PM (IST)

    हाथरस में रामवीर उपाध्याय के निधन के बाद बसपा नेतृत्व और संगठन को मजबूत करने की चुनौती का सामना कर रही है। 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी को ...और पढ़ें

    सांकेतिक तस्वीर।

    सांकेतिक तस्वीर।

    HighLights

    1. रामवीर उपाध्याय के बाद बसपा में नेतृत्व का संकट।

    2. 2022 चुनावों में पार्टी का खराब प्रदर्शन रहा।

    3. 2027 के लिए संगठन व जनाधार मजबूत करना।

    अभिषेक तायल, हाथरस। जिले की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी का जिक्र हो और रामवीर उपाध्याय का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं है। करीब ढाई दशक तक जिले की राजनीति में उनका प्रभाव रहा और बसपा का संगठन भी काफी हद तक उनके नेतृत्व के इर्द-गिर्द खड़ा रहा। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले उनके बसपा छोड़ने और उसी वर्ष सितंबर में उनके निधन के बाद पार्टी के सामने नए राजनीतिक हालात खड़े हो गए।

    अब 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को पहले जैसी मजबूती देना, प्रभावी स्थानीय नेतृत्व तैयार करना और तीनों विधानसभा क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक पकड़ को फिर मजबूत करना है।

    2027 से पहले संगठन, नेतृत्व और जनाधार को फिर मजबूत करने की चुनौती

    जिले में बसपा का राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ाव से गुजरा है। एक दौर ऐसा भी था जब पार्टी जिले की राजनीति की प्रमुख ताकतों में गिनी जाती थी। 2007 और 2012 के चुनाव में उसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई दिया। 2017 में प्रदेश में भाजपा की प्रचंड जीत के बावजूद रामवीर उपाध्याय सादाबाद सीट से बसपा का परचम लहराने में सफल रहे।

    2022 में पार्टी का नहीं खुला था खाता 

    हालांकि 2022 के चुनाव में पार्टी का खाता नहीं खुला। हाथरस (सुरक्षित) सीट पर बसपा दूसरे स्थान पर रही, जबकि सादाबाद और सिकंदराराऊ में वह मुख्य मुकाबले से पीछे रह गई। इन परिणामों ने साफ कर दिया कि 2027 में वापसी के लिए पार्टी को केवल पुराने समीकरणों पर नहीं, बल्कि नई रणनीति के साथ मैदान में उतरना होगा।

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    बदले सियासी समीकरणों के बीच वापसी की राह आसान नहीं

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिल में बसपा की ताकत सिर्फ उसका परंपरागत वोट बैंक नहीं था, मजबूत बूथ संगठन और स्थानीय नेतृत्व भी उसकी पहचान रहे हैं।

    रामवीर उपाध्याय के पार्टी छोड़ने के बाद संगठन को झटका लगा। कई पुराने कार्यकर्ता निष्क्रिय हुए तो कुछ अन्य दलों की ओर चले गए। अब पार्टी संगठन को फिर सक्रिय करने, सदस्यता अभियान चलाने और बूथ स्तर तक नई टीम तैयार करने पर जोर दे रही है।

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    आगामी चुनावों में नेतृत्व का सवाल अहम

    2027 के चुनाव में बसपा के सामने नेतृत्व का सवाल भी अहम है। फिलहाल जिले में ऐसा कोई चेहरा नजर नहीं आता, जिसकी स्वीकार्यता तीनों विधानसभा क्षेत्रों में समान रूप से हो। ऐसे में पार्टी सामूहिक नेतृत्व के सहारे आगे बढ़ रही है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि संगठन मजबूत हुआ और स्थानीय स्तर पर प्रभावी नेतृत्व उभरा तो बसपा फिर मुकाबले में अपनी स्थिति बेहतर कर सकती है। हालांकि बदले राजनीतिक माहौल में यह राह आसान नहीं मानी जा रही।

    क्यों कठिन हुई बसपा की राह

    1. रामवीर उपाध्याय के बसपा छोड़ने के बाद नेतृत्व का खालीपन।
    2. 2022 में जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर हार।
    3. बूथ स्तर पर संगठन को दोबारा मजबूत करने की जरूरत।
    4. परंपरागत जनाधार को बनाए रखने के साथ नए मतदाताओं तक पहुंच की चुनौती।
    5. तीनों विधानसभा क्षेत्रों का अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समीकरण।

    हाथरस में बसपा का चुनावी सफर

    • 2007- बसपा का जिले में मजबूत प्रदर्शन, रामवीर उपाध्याय का प्रभाव चरम पर।
    • 2012- सिकंदराराऊ सीट पर बसपा की जीत, जिले में प्रभाव बरकरार।
    • 2017- भाजपा लहर के बीच भी रामवीर उपाध्याय ने सादाबाद सीट बसपा के खाते में रखी।
    • 2022- तीनों सीटों पर हार, हाथरस सीट पर दूसरे स्थान पर रही पार्टी।

    रामवीर उपाध्याय क्यों थे अहम

    1. हाथरस की राजनीति में बसपा का सबसे बड़ा चेहरा।
    2. पांच बार विधायक रहे।
    3. हाथरस, सिकंदराराऊ और सादाबाद तीनों विधानसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व किया।
    4. मायावती सरकार में ऊर्जा मंत्री सहित कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले।
    5. 2022 में बसपा छोड़ भाजपा में शामिल हुए।
    6. सितंबर 2022 में निधन के बाद नेतृत्व का खालीपन उभरकर सामने आया।

    2027 में बसपा के सामने पांच बड़ी चुनौती

    पार्टी द्वारा जिले में नया प्रभावी चेहरा तैयार कर पाना।
    बूथ और सेक्टर स्तर का संगठन पहले जैसा सक्रिय होना।
    परंपरागत वोट बैंक को फिर मजबूती से जोड़ना।
    तीनों सीटों पर उम्मीदवारों का प्रभावी चयन।
    बसपा का जिले में निर्णायक राजनीतिक ताकत बन पाना।

    चुनावी तस्वीर

    हाथरस सदर
    2022 में बसपा दूसरे स्थान पर रही, लेकिन जीत से काफी दूर रही।

    सादाबाद

    2017 में रामवीर उपाध्याय ने बसपा को जीत दिलाई, लेकिन 2022 में पार्टी तीसरे स्थान पर पहुंच गई।

    सिकंदराराऊ


    एक समय बसपा की मजबूत सीट रही, लेकिन पिछले दो चुनावों में पार्टी यहां अपनी पुरानी पकड़ कायम नहीं रख सकी।

    वर्ष-- सीट--- बसपा प्रत्याशी-- वोट प्रतिशत-- स्थान

    2012-- सदर-- गेंदा लाल चौधरी-- 28.88-- पहला
    2012-- सादाबाद-- सतेंद्र शर्मा-- 31.09-- दूसरा
    2012-- सिकंदराराऊ--रामवीर उपाध्याय--45.81-- पहला
    2017-- सदर-- बृजमोहन राही-- 26.62-- दूसरा
    2017-- सादाबाद-- रामवीर उपाध्याय--40.34-- पहला
    2017-- सिकंदराराऊ-- बनी सिंह बघेल--28.37-- दूसरा
    2022-- सदर-- संजीव कुमार-- 20.45-- दूसरा
    2022-- सादाबाद-- डा. अविन शर्मा--13.43-- तीसरा
    2022-- सिकंदराराऊ-- अवधेश कुमार--17.82-- तीसरा

    बहुजन समाज पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने में जुटी है। कार्यकर्ताओं की मेहनत और मजबूत संगठन के दम पर 2027 विधानसभा चुनाव में पार्टी बेहतर प्रदर्शन करेगी और प्रदेश में सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है।

    -

    राज कपूर, जिलाध्यक्ष, बसपा

    2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां पूरी गंभीरता से चल रही हैं। संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया जा रहा है और पार्टी नेतृत्व लगातार इसकी समीक्षा कर रहा है। हमें विश्वास है कि मजबूत संगठन और समर्पित कार्यकर्ताओं के दम पर बसपा प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन करेगी।

    -

    अनिल बघेल, मुख्य मंडल प्रभारी, बसपा अलीगढ़ मंडल