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    कानून भूली पुलिस: हाथरस गैंगवार मामले में प्राणघातक हमले की धारा हटाई, कोर्ट से छूटा छोटू

    Updated: Wed, 01 Jul 2026 11:07 AM (IST)

    अदालत ने पुलिस की कार्रवाई को कानून के विपरीत बताते हुए छोटू राणा को 25 हजार के निजी बंधपत्र पर रिहा करने का आदेश दिया, क्योंकि मामले में सात साल से क ...और पढ़ें

    आरोपित छोटू राणा। जागरण

    आरोपित छोटू राणा। जागरण

    HighLights

    1. पुलिस ने प्राणघातक हमले की गंभीर धारा हटाई थी।

    2. सीजेएम कोर्ट ने पुलिस रिमांड प्रार्थना पत्र निरस्त किया।

    3. छोटू राणा को निजी बंधपत्र पर रिहा किया गया।

    अभिषेक तायल, हाथरस। 19 जून को हतीसा बाईपास स्थित कैलाश ढाबे के पास हुई गैंगवार और 25 राउंड फायरिंग के मामले में पुलिस की विवेचना और गिरफ्तारी की कार्रवाई अदालत में सवालों के घेरे में आ गई। जिस मुकदमे में विवेचना के दौरान पुलिस ने खुद प्राणघातक हमले से संबंधित गंभीर धारा हटा दी थी, उसी मुकदमे में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की अनिवार्य प्रक्रिया अपनाए बिना आरोपित विजय प्रताप राणा उर्फ छोटू राणा को गिरफ्तार कर अदालत में पेश कर दिया।

    मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पुलिस की 14 दिन की न्यायिक अभिरक्षा की मांग ठुकराते हुए स्पष्ट कहा कि सात वर्ष से कम सजा वाले अपराध में धारा-35 (3) के तहत नोटिस दिए बिना गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। अदालत ने पुलिस का रिमांड प्रार्थना पत्र निरस्त कर आरोपित को 25 हजार रुपये के निजी बंधपत्र पर रिहा करने का आदेश दे दिया।

    मुकदमे में विवेचना के दौरान धारा-109 हटा दी गई

    कोर्ट ने आदेश में कहा कि 19 जून को दर्ज मुकदमे में विवेचना के दौरान धारा-109 हटा दी गई। इसके बाद मुकदमे में केवल सात वर्ष से कम सजा वाली धाराएं ही शेष रहीं। इसके बावजूद पुलिस ने यह नहीं बताया कि धारा-35(3) के तहत नोटिस क्यों नहीं दिया गया। केस डायरी में भी ऐसा कोई ठोस आधार दर्ज नहीं मिला, जिससे बिना नोटिस गिरफ्तारी को उचित ठहराया जा सके।

    गिरफ्तारी प्रपत्र में केवल औपचारिक खानापूर्ति की गई

    अदालत ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी प्रपत्र में केवल औपचारिक खानापूर्ति की गई है। पुलिस यह स्थापित नहीं कर सकी कि आरोपित के फरार होने, गवाहों को प्रभावित करने, साक्ष्य नष्ट करने या दोबारा अपराध करने की तत्काल आशंका थी। ऐसे में सीधे गिरफ्तारी करना कानून की मंशा के विपरीत है।

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    आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य और सतीश अंटिल बनाम सीबीआइ के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया कि सात वर्ष तक की सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होनी चाहिए। पुलिस को पहले वैधानिक नोटिस जारी कर जांच में शामिल होने का अवसर देना अनिवार्य है।

    एक नजर में पूरा घटनाक्रम

    • 19 जून को हतीसा बाईपास स्थित कैलाश ढाबा के पास दो गुटों में गैंगवार, करीब 25 राउंड फायरिंग
    • पुलिस ने 8 नामजद और अज्ञात के खिलाफ 10 विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था
    • विवेचना के दौरान पुलिस ने प्राणघातक हमले से संबंधित धारा हटा दी
    • 29 जून को छोटू राणा गिरफ्तार, 14 दिन की न्यायिक अभिरक्षा मांगी
    • 30 जून को सीजेएम ने रिमांड ठुकराई, निजी बंधपत्र पर रिहाई के आदेश दिए 

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    सीजेएम ने कहा कार्रवाई कानून के विपरीत, नहीं मिल सकती 14 दिन की रिमांड 

    1. कोर्ट ने पुलिस की इन चार चूकों को माना गंभीर
    2. विवेचना में गंभीर धारा हटाने के बाद भी कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई
    3. बीएनएसएस की धारा-35(3) के तहत नोटिस जारी नहीं किया
    4. केस डायरी में गिरफ्तारी की अपरिहार्यता का कोई ठोस कारण दर्ज नहीं किया
    5. सीधे गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा मांगी जो नियम अनुसार गलत है
    6. कोर्ट के आदेश की पांच बड़ी बातें
    7. प्राणघातक हमले से संबंधित धारा विवेचना में हट चुकी है
    8. मुकदमे में सात वर्ष से कम सजा वाली धाराएं ही शेष हैं
    9. ऐसे मामलों में पहले नोटिस देना अनिवार्य है
    10. पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया
    11. रिमांड प्रार्थना पत्र निरस्त कर आरोपित को रिहा करने के आदेश दिए

    क्या कहती है सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन

    अधिवक्ता गोविंद उपाध्याय ने बताया कि सात वर्ष तक की सजा वाले मामलों में पुलिस को गिरफ्तारी से पहले बीएनएसएस की धारा-35(3) के तहत नोटिस देना होता है। यदि आरोपित जांच में सहयोग करता है तो सामान्य परिस्थितियों में सीधे गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। गिरफ्तारी तभी होगी जब पुलिस उसके लिए ठोस और दर्ज कारण बताए।


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