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    जालौन: डकैतों के खौफ से उभरे तो बाढ़ ने उजाड़ा, डर के साय में जी रहे ग्रामीण जंगल में रहने को मजबूर

    Updated: Fri, 07 Aug 2026 02:52 PM (GMT+05:30)

    जालौन के महेवा क्षेत्र में यमुना पट्टी के छह गांव, खासकर सिमरा शेखपुर, 25 साल पहले डकैतों और अब बाढ़ की विभीषिका के कारण उजाड़ हो गए हैं। ...और पढ़ें

    रामपाल और विमला देवी, ग्रामीण

    रामपाल और विमला देवी, ग्रामीण

    संवाद सूत्र, जालौन। महेवा क्षेत्र के यमुना पट्टी के छह गांव 25 साल पहले डकैतों की दहशत तो अब बाढ़ की विभीषिका से गांव छोड़कर ऊंचे स्थान पर निजी भूमि या टीलों पर बस गए हैं। जिसमें एक गांव सिमरा शेखपुर के लोग तो यमुना नदी में हर साल आने वाली बाढ़ से अब लगभग बर्बाद हो चुके हैं।

    वर्ष 2021 अगस्त में बाढ़ से आहत 60 परिवार गांव छोड़कर ऊंचे टीलों पर आशियाना बसा चुके हैं। इसमें 47 को मुख्यमंत्री आवास मिल चुके हैं, तेरह परिवार ऐसे हैं जो अभी भी घास फूस की झोपड़ी में तिरपाल लगा कर रह रहे हैं। क्षेत्र के 12 गांव के परिषदीय स्कूलों में भी बाढ़ के दौरान अवकाश घोषित करना पड़ता है। जिन लोगों को आवास अभी तक नहीं मिले हैं उनके नाम इस साल पात्रता की सूची में शामिल किए गए हैं।

    महेवा ब्लॉक में यमुना पट्टी के ग्राम सिमरा शेखपुर यमुना के किनारे होने से पचास साल पहले तक जल यातायात से व्यापार का बड़ा ठिकाना माना जाता था। यहां के लोग बताते हैं कि कालपी व औरैया बाजार तक पहुंचने के लिए कोई भी पक्का रास्ता नहीं था।

    बैलगाड़ी से जंगल के रास्ते से कालपी पहुंचने में दो दिन लग जाते थे। उस दौर में जल यातायात से एक दिन में ही किसानों का अनाज कालपी और औरैया मंडी पहुंच जाता था। 1980 के आसपास यमुना पट्टी के गांव डकैतों की दहशत से परेशान रहे। 65 वर्षीय कालका प्रसाद बताते हैं कि डकैतों का साम्राज्य समाप्त होने के बाद सुकून की जिंदगी जी रहे थे लेकिन दस साल से लगातार यमुना नदी में बरसात के दौरान बाढ़ आने से घर व गृहस्थी बर्बाद हो जाने से मरम्मत पर पूरी आमदनी खर्च हो जाती थी।

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    वर्ष 2021 अगस्त में बाढ़ के विकराल रूप से 70 से अधिक घरों में पानी भर गया। बचाव करते हुए 60 परिवार गांव छोड़कर ऊंचे टीलों पर आकर बस गए। तत्कालीन बीडीओ अतिरंजन सिंह ने नई बस्ती को स्मार्ट नगर बनाने की योजना बनाई थी।

    उनके स्थानांतरण हो जाने के बाद प्रशासन ने मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत बाढ़ पीड़ितों को आवास मुहैया जरूर कराए। बीडीओ अरुण कुमार कहते हैं कि झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले पात्र बाढ़ पीड़ितों के नाम आवास की सूची में सम्मिलित किए गए हैं। बजट आने पर प्राथमिकता से आवास आवंटित किए जाएंगे।

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    बाढ़ में बंद हो जाते हैं स्कूल

    यमुना में बाढ़ आ जाने से करीब 12 स्कूल बंद हो जाते हैं, उसके बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। देवकली स्कूल में छात्र 219, गुढाखास में छात्र 106, नया पुरवा में 19, शेखपुर गुढ़ा में 132, मैनूपुर में 209, हीरापुर में 119, पड़री में 22, कीरतपुर में 130, मदारपुर में 34, उरकरा कला में 107, हथनौरा 79, पिपरौधा 65 छात्र, सिमरा शेखपुर में 72 छात्र हैं। सभी की शिक्षा प्रभावित होती है।

    अन्य दिक्कत

    जहां 60 परिवारों की बस्ती है वहां बिजली एवं पानी की व्यवस्था है। हैंड पंप हैं। गांव से एक किलोमीटर दूर ऊंचे स्थान पर रह रहे हैं।

    बाढ़ का पानी घट जाने के बाद भी यहीं रहते हैं। खेती का काम यहीं से करते हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए कोई अस्पताल नहीं है। बीमार होने पर 10 किलोमीटर दूर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नियामतपुर जाते हैं।

    लोगों की बात

    हर साल बाढ़ आने से बहुत नुकसान हो जाता था, इसीलिए पांच वर्ष से गांव छोड़कर ऊंचे स्थान पर रहने लगे। आवास न मिलने से यहां घास फूस की झोपड़ी में दिन गुजर रहे हैं।- रामपाल, ग्रामीण।


    पांच वर्ष पहले 60 परिवार गांव छोड़कर ऊंचे स्थान पर रहने लगे थे। तब अधिकारियों ने कहा था बाढ़ पीड़ितों को आवास मिलेंगे अभी तक नहीं मिला।- विमला देवी, ग्रामीण।

    थोड़ी-थोड़ी बचत करके गांव में घर बनवाया था, बाढ़ से वह भी बर्बाद हो गया अब यहां घास फूस की झोपड़ी में रह रहे हैं।- मिथिलेश कुमारी, ग्रामीण।

    बाढ़ के समय अधिकारियों एवं नेताओं ने बड़े-बड़े वादे किए थे, कि सभी पीड़ितों को दो वर्ष में आवास मिल जाएंगे, पांच वर्ष बीत गए तिरपाल के नीचे जिंदगी काट रहे हैं।- शिवरानी देवी, ग्रामीण।

    बरसात के दौरान झोपड़ी में रात-दिन गुजारना कठिन हो जाता है, कई बार जंगली जीव जंतु आ जाते हैं।- देवेंद्र दोहरे, ग्रामीण