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    सूतफेनी का 136 साल का मीठा सफर, फतेहपुर के जहानाबाद से कानपुर तक स्वाद की अनोखी विरासत

    Updated: Sat, 01 Aug 2026 03:27 PM (IST)

    फतेहपुर के जहानाबाद में 1890 में अइय्या जैन द्वारा शुरू की गई सूतफेनी का स्वाद अब कानपुर तक पहुंच गया है। यह पारंपरिक मिठाई 'एक जिला, एक व्यंजन' योजना ...और पढ़ें

    घी में सूतफेनी निकालते कारीगर। जागरण

    घी में सूतफेनी निकालते कारीगर। जागरण 

    HighLights

    1. सूतफेनी की शुरुआत 1890 में फतेहपुर के जहानाबाद में हुई

    2. मैदा और देशी घी से पारंपरिक विधि से बनती है सूतफेनी

    3. 'एक जिला, एक व्यंजन' योजना में शामिल, कारीगरों को ऋण सहायता

    जागरण संवाददाता, फतेहपुर। बात जब तहजीब और खानपान की हो तो कानपुर और पड़ोस के फतेहपुर जिले का दिल एक साथ धड़कता है। अपने बेजोड़ स्वाद के लिए मशहूर कानपुर की गलियों में बिकने वाली लच्छेदार सूतफेनी का सीधा संबंध फतेहपुर से है। यहां के जहानाबाद में करीब 136 साल पहले (1890 में) जैन समाज की अइय्या जैन ने अपने हाथों से जो सूतफेनी बनानी शुरू की थी, वह आज कानपुर के बाजार की भी शान है। मुंह में घुल जाने वाली इस ऐतिहासिक सूतफेनी के सफरनामे पर पढ़िए जागरण संवाददाता गोविंद दुबे की रिपोर्ट...

    फतेहपुर के जहानाबाद में जैन समाज की अइय्या जैन ने 1890 में करीब 136 वर्ष पहले मैदा व देशी घी से बारीक रेशे वाली ऐसी सूतफेनी बनाना शुरू किया जो मुंह में जाते ही घुल जाती थी। अइय्या जैन के परपोते कुमकेश जैन बताते हैं कि सूतफेनी की मांग बढ़ी तो परदादी ने सूतफेनी बनाने के लिए आसपास गांव के लोगों को काम पर रखना शुरू किया। इस तरह, सैकड़ों लोगों ने इस हुनर को सीखा और फिर जिले के अलावा दूसरे प्रांतों में भी सूतफेनी बनाने का काम करने लगे।

    पारंपरिक विधि से सूतफेनी बनाने के लिए सबसे पहले छने हुए मैदा में पानी मिलाकर एक चिकना आटा तैयार किया जाता है, फिर इस आटे की लोइयां बनाकर उन्हें शुद्ध देशी घी में डुबोकर रखा जाता है। कारीगर अंगुलियों से मैदा की लोई की माला बनाकर उसे फंदा बनाते हैं। पांच बार फंदा बनाकर कुछ देर के लिए रख दिया जाता है। इसके बाद फिर थोड़ी-थोड़ी देर रुककर तीन-तीन फंदे बनाए जाते हैं। इसके बाद घी में धीमी आंच में तला जाता है।

    तली हुई सूतफेनी बारीक रेशेदार तैयार हो जाती है। दूध में चीनी मिलाकर सूतफेनी को उसमें डाल दिया जाता है। इस तरह, यह सूतफेनी तैयार हो जाती है। देशी घी से तैयार सूतफेनी की कीमत 600 रुपये जबकि वनस्पति घी व रिफाइंड से बनी सूतफेनी कीमत 220 से 250 रुपये प्रति किलो तक है।

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    उपायुक्त उद्योग अजय कुमार गुप्ता बताते हैं कि एक जिला, एक व्यंजन योजना में मलवां के पेड़े के साथ ही सूतफेनी को भी शामिल किया गया है। सूतफेनी के कारीगरों को उत्पाद की गुणवत्ता को बढ़ाने व मार्केटिंग के लिए अनुदान पर 25 लाख तक का ऋण भी उपलब्ध कराया जा रहा है।

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