कानपुर के धूल में छिपी चमक... जिसे लोग कचरा समझें, उसे 'न्यारा' वाले बना देते हैं सोना
कानपुर के सर्राफा बाजार की धूल में छिपे सोने के महीन कणों को निकालने की पारंपरिक प्रक्रिया 'न्यारा' कई परिवारों ...और पढ़ें

HighLights
सर्राफा बाजार की धूल से सोना निकालने की 'न्यारा' प्रक्रिया।
रात में धूल इकट्ठा कर 5-6 घंटे में सोना होता है प्राप्त।
एकत्रित धूल से 300-400 मिलीग्राम तक सोना निकलने की संभावना।
अमन तिवारी, कानपुर। दिनभर सर्राफा बाजार में लोगों के पैरों तले रौंदी जाने वाली धूल रात ढलते ही कुछ लोगों के लिए बेशकीमती खजाने में बदल जाती है। आम लोगों को जो धूल महज कचरा नजर आती है, उसी में छिपे सोने के महीन कण तलाशकर ''''न्यारा'''' करने वाले परिवार अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। बाजार की रौनक खत्म होने के बाद देर रात झाड़ू, ब्रश और तसले के साथ ये लोग दुकानों के बाहर पहुंचते हैं और बड़ी बारीकी से धूल समेटने का काम शुरू करते हैं।
दरअसल, सोने-चांदी के आभूषणों की कटाई, घिसाई और पालिश के दौरान धातु के अत्यंत महीन कण हवा, कपड़ों, जूतों और झाड़ू के साथ बाहर निकलकर धूल में मिल जाते हैं। इन्हीं कणों को अलग करने की पारंपरिक प्रक्रिया को स्थानीय भाषा में ''''न्यारा'''' कहा जाता है। वर्षों के अनुभव से जुड़े लोग पहचान लेते हैं कि किस दुकान के बाहर की धूल में कितना कीमती धातु छिपा हो सकता है।
सर्राफा कारोबारियों के मुताबिक, जिन दुकानों में आभूषण निर्माण और मरम्मत का काम अधिक होता है, वहां के बाहर एकत्र धूल से औसतन 300 से 400 मिलीग्राम तक सोना निकल सकता है। वहीं हस्तनिर्मित आभूषण तैयार करने वाली दुकानों के आसपास यह मात्रा और अधिक होने की संभावना रहती है। यही वजह है कि दुकानों के बाहर की धूल भी इन लोगों के लिए अनमोल मानी जाती है।
धूल इकट्ठा करने के बाद असली मेहनत शुरू होती है। पहले उसे कई बार पानी से धोया और छाना जाता है। फिर विशेष तरीके से सुखाकर तेज आंच पर गलाया जाता है, जिससे धूल में छिपे सोने के कण अलग हो जाते हैं। पूरी प्रक्रिया में करीब पांच से छह घंटे लगते हैं और तब जाकर मेहनत का फल मिलता है।
इस काम से जुड़े लोगों का कहना है कि वे हमेशा रात में ही काम करते हैं, ताकि बाजार की गतिविधियां प्रभावित न हों। कई परिवार पीढ़ियों से इसी पेशे से जुड़े हैं। बदलते दौर और आधुनिक तकनीक के बावजूद ''''न्यारा'''' की यह पारंपरिक कला आज भी जिंदा है और यह साबित करती है कि कभी-कभी सबसे बड़ी दौलत वहीं छिपी होती है, जिसे दुनिया बेकार समझकर ठुकरा देती है।
क्या है 'न्यारा' ?
- आभूषण निर्माण के दौरान उड़ने वाले सोने-चांदी के महीन कण धूल में मिल जाते हैं।
- दुकानों के बाहर जमा धूल को इकट्ठा कर विशेष प्रक्रिया से सोना अलग किया जाता है।
- एक बार की प्रक्रिया में पांच से छह घंटे तक मेहनत लगती है।
- अधिक काम वाली दुकानों की धूल से 300-400 मिलीग्राम तक सोना निकलने की संभावना रहती है।
300-400 मिली ग्राम तक सोना निकलता है...
लाला पुरुषोत्तम दास के संचालक विवेक गुप्ता बताते हैं कि दुकानदार आमतौर पर झाडू अंदर की ओर लगते हैं, जबकि बाहर की सफाई न्यारा करने वाले करते हैं। यदि दस दुकानों के सामने की धूल एकत्र की जाए तो उससे लगभग 300 से 400 मिलीग्राम तक सोना निकाला जा सकता है।
ऐसे प्राप्त होता है धूल से सोना
धूल एकत्र कर न्यारा करने वाले उससे एक विशेष प्रक्रिया से साेना निकालने की कोशिश करते हैं। धूल एकत्र करने के बाद इसे कई बार धोया जाता है। इसके बाद जो गाद बैठती है उसे रांगा डालकर रिफाइन किया जाता है। करीब पांच से छह घंटे की लगातार मेहनत के बाद सोना प्राप्त होता है।
दुकान के अंदर की धूल का होता है ठेका ....
न्याया करने वाले दुकान के बाहर से बिना कुछ रकम चुकाए धूल एकत्र कर लेते हैं लेकिन भीतर की धूल का ठेका हाेता है। भीतर की धूल का ठेका दुकान में होने वाले सोने के काम से तय होता है। जहां आभूषण निर्माण का काम होता है, वहां की धूल का सालभर का ठेका औसतन 50 से 70 हजार तक में ठेका होता है। बड़ी दुकानो से धूल इकट्ठा करने करने के लिए न्यारा करने वालों को तकरीबन डेढ़ लाख रुपयों तक चुकाना पड़ता है।
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देशभर में होता है यह काम
विगत 13 वर्षो से इस काम में लगे राजू बताते हैं कि यह उनका खानदानी पेशा है। वह पूरे देशभर में सर्राफा बाजारों के बाहर की रेत इकट्ठा करते हैं। नौ सालों से इस काम में लगे सरवर का कहना है कि उनके परिवार की कई पीढि़यां इसी हुनर से जुड़ी रही हैं। वह बताते हैं कि सुबह सूर्योदय से पहले वह अपना काम खतम कर लेते हैं। इसके पीछे यह मकसद होता है कि धूल उड़ने से आम लोगों को कोई समस्या न हो।
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