Kaushambi Incident : पटाखा फैक्ट्री में हादसे के बाद दिल दहलाने वाला दिखा मंजर, मलबे में जिंदगी की होती रही तलाश; गरजती रही JCB
कौशांबी के महमूदपुर मनौरी गांव में अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए विस्फोट से दो फैक्ट्री समेत आठ दो मंजिला घर ...और पढ़ें
HighLights
पटाखा फैक्ट्री विस्फोट में दो फैक्ट्री समेत आठ घर जमींदोज
मलबे में दबे लोगों को निकालने में लगे 10 बैकहो लोडर
जागरण संवाददाता, कौशांबी। Kaushambi Pataka Factory Blast महमूदपुर मनौरी गांव में अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण विस्फोट के बाद का मंजर दिल दहला देने वाला था। आबादी के बीच संचालित फैक्ट्री में धमाके ने दो फैक्ट्री समेत आठ दो मंजिला घरों को पलभर में मलबे में बदल दिया। जहां कुछ घंटे पहले तक घरों में जिंदगी सांस ले रही थी, वहां अब ईंट, सरिया और टिनशेड के टुकड़े बिखरे थे। हर तरफ तबाही थी और उसी मलबे के नीचे अपनों के दबे होने की आशंका से स्वजन की सांसें अटकी थीं।
विस्फोट की सूचना के बाद डीएम डा. अमित पाल, एसपी सत्यनारायण प्रजापत पुलिस, फायर ब्रिगेड, स्वास्थ्य टीम के साथ मौके पर पहुंचे व बचाव राहत कार्य शुरू कराया। भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता था कि आसपास के कई घर पूरी तरह जमींदोज हो गए। अफसरों को भी सूझ नहीं रहा था कि बचाव कार्य की शुरूआत किस दिशा से की जाए? हर तरह चीख-पुकार मची थी।
भीड़ में मौजूद लोगों की जुबां पर सिर्फ यहीं था कि साहब इस घर का मलबा हटवाइए, दो मंजिला घर था। इसमें कई लोग दबे होंगे। आशंका व्यक्त की गई कि हर घर में चार से छह लोग मौजूद रहे होंगे। ऐसे में मलबे का एक-एक हिस्सा जिंदगी और मौत के बीच की उम्मीद बन गया था। इस बीच वहां पहुंचे गया प्रसाद साहू माथा पीटते हुए फफक पड़े। गया प्रसाद ने बताया कि पूरा कुनबा समाप्त हो गया है। गया के घर पर बैकहो लोडर चला तो मलबे में दबी उसकी पत्नी घायल मिली। जबकि, चार बच्चे मौत का शिकार हो चुके थे।
इसी तरह, रेलकर्मी विक्रम भोजन करने घर आया था। घटना में विक्रम, उसकी पत्नी अंजू, बेटी अंशू व चार वर्षीय बेटा बऊवा काल के गाल में समा चुके थे। सबसे बड़ी बेटी संजना किराना की दुकान में कुछ सामान लेने गई थी। वह सुरक्षित है। कमोवेश ज्यादातर घरों में भी यही कयास लगाए जा रहे थे। विभिन्न नगर पंचायतों से 10 बैकहो लोडर (जेसीबी) मौके पर बुलाए गए थे, लेकिन वह भी नाकाफी पड़ रहे थे।
Kaushambi Pataka Factory Blast बैकहो लोडर यानी जेसीबी की गरज के बीच मजदूर और राहतकर्मी ईंट-सरिया हटाते रहे। हर बार मलबे का ढेर थोड़ा कम होता तो वहां मौजूद लोगों की निगाहें उसी जगह टिक जातीं, शायद कोई अपना मिल जाए। एंबुलेंस के सायरन के साथ लोगों की उम्मीदें भी दौड़ती रहीं। उस भयावह वक्त में किसी के पास यह कहने का साहस नहीं था कि जिसे जिंदगी बचाने की उम्मीद में अस्पताल भेजा जा रहा है, वह वहां तक सांसों के साथ पहुंच पाएगा या नहीं।
