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    गंडक की 'चेपुआ' अब होगी ग्लोबल, शोध में लगे विज्ञानी

    Updated: Sun, 26 Jul 2026 12:52 PM (IST)

    बड़ी गंडक नदी की 'चेपुआ मछली' को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने और उसके घटते प्राकृतिक स्टॉक को बचाने के लिए मत्स्य विभाग ने विज्ञानियों की टीम लगाई है। य ...और पढ़ें

    हैचरी तैयार करने व इसकी कृत्रिम ब्रीडिंग पर है फाेकस। जागरण

    हैचरी तैयार करने व इसकी कृत्रिम ब्रीडिंग पर है फाेकस। जागरण

    HighLights

    1. चेपुआ मछली को वैश्विक पहचान दिलाने का प्रयास जारी।

    2. कृत्रिम ब्रीडिंग सफल होने पर मछुआरों की आय बढ़ेगी।

    3. इसकी पौष्टिकता सैलमन मछली से भी अधिक बताई गई।

    अजय कुमार शुक्ल, कुशीनगर। बड़ी गंडक (नारायणी) नदी में पाई जाने वाली ‘चेपुआ मछली’ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान चमका सकती है। उत्तर प्रदेश मत्स्य विभाग ने इसके घटते प्राकृतिक स्टाक को बचाने और इसकी कृत्रिम ब्रीडिंग की संभावनाएं तलाशने के लिए विज्ञानियों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की टीम लगाई है।

    वर्ल्ड फिशरीज के विशेषज्ञ अरुण पाड़ियार और नेशनल ब्यूरो आफ फिश जेनेटिक रिसोर्सेज के वैज्ञानिक इसके प्राकृतिक आवास, पानी की गुणवत्ता, शिकार पद्धति और प्रजनन काल पर शोध कर रहे हैं। विज्ञानियों का मुख्य उद्देश्य चेपुआ मछली की हैचरी तैयार करना है। यदि इसकी कृत्रिम ब्रीडिंग का प्रयोग फल हो जाता है, तो स्थानीय मछुआरों और इस व्यवसाय से जुड़े हजारों लोगों की आय कई गुना बढ़ जाएगी।

    चेपुआ सिर्फ स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी बेजोड़ पौष्टिकता के लिए भी जानी जाती है। शोध के मुताबिक, दुनिया भर के मीठे और खारे पानी में मिलने वाली मशहूर सैलमन मछली से भी अधिक पौष्टिकता चेपुआ में होने की बात कही जा रही। चेपुआ मछली की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह नदी के पानी से बाहर आते ही बहुत कम समय में दम तोड़ देती है, इसलिए स्थानीय स्तर पर इसके लाइव सैंपलिंग को लेकर एक बड़ी चुनौती है।

    वर्तमान में इसका 100 प्रतिशत उत्पादन केवल बड़ी गंडक (नारायणी) नदी से प्राकृतिक शिकार (मछुआरों द्वारा जाल डालकर पकड़ने) पर निर्भर है। नवंबर से मार्च के बीच यह नदी के किनारों पर हरी घास के आसपास ज्यादा मिलती है। दरअसल, इसकी लाइव सैंपलिंग को लेकर एक बड़ी चुनौती है।

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    ऐसे में विज्ञानियों की टीम स्थानीय मछुआरों की मदद से विशेष जल-मापक यंत्रों के जरिये बड़ी गंडक नदी के पानी की गुणवत्ता (आक्सीजन लेवल, पीएच मान और पानी में मौजूद खास शैवाल-काई) को आन-स्पाट माप चुके हैं। कुछ जीवित मछलियों को विशेष आक्सीजन युक्त कंटेनरों में रखकर लखनऊ स्थित कृत्रिम फार्म (ब्रीडिंग सेंटर) ले जाया गया है, ताकि उनके रहन-सहन और भोजन (प्राइमरी डाइट) की गुत्थी सुलझाई जा सके।

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    नवंबर से मार्च के बीच इनका प्रजनन काल होता है। अगर इसकी हैचरी और कृत्रिम ब्रीडिंग तकनीक सफल हो जाती है तो इसे आम तालाबों में भी पाला जा सकेगा और तब इसका उत्पादन टन में रिकार्ड किया जा सकेगा।

    सरकार संजीदगी से इस पर कर रही कार्य: विधायक
    भाजपा के खड्डा विधायक विवेकानंद पाण्डेय ने बताया कि, इसको लेकर सरकार संजीदगी कार्य कर रही है। मत्स्य विकास मंत्री डा. संजय निषाद ने इसको लेकर तीन वर्ष पूर्व खड्डा में चेपुआ के वैश्विक पहचान दिलाने की बात कही थी। उसके बाद सरकार के सामने बात रखी, जो अब रंग ला रही है। सरकार द्वारा लगाई गई विशेष टीम शीघ्र सकारात्मक परिणाम के साथ खड़ी होगी।

    विज्ञानियों का दल इस पर एक वर्ष से अधिक समय से कार्य कर रहा है। शोध की सफलता केवल कुशीनगर के लिए नहीं, पूरे देश के लिए मछली बाजार को नया उपहार देगी, जिसमें स्वाद के साथ आर्थिक विकास भी शामिल होगा। विज्ञानी जैसे ही कृत्रिम जल स्रोतों में इसके प्रजनन व रहने की सफलता पा लेंगे, पूरी दुनिया में इसकी मांग भी खड़ी होगी, तब चेपुआ लोकल से ग्लोबल हो जाएगी। शीघ्र ही सफलता की भी उम्मीद है।

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    -महेंद्र सिंह तंवर डीएम