जब नदी खुद सुनाने लगी दर्द: 'मैं नारायणी हूं... मेरी गोद में मोक्ष नहीं, मौत का मलबा बह रहा है'
नारायणी नदी नेपाल बाढ़ त्रासदी का दर्द बयां कर रही है, जहां उसकी लहरों में मोक्ष नहीं, बल्कि मौत का ...और पढ़ें
-1788414166181_m.webp)
मोक्षदायिनी नारायणी। जागरण
HighLights
नारायणी नदी में नेपाल बाढ़ का मलबा और शव।
कुशीनगर तट पर उजड़े घरों के सामान, पहचान मुश्किल।
नदी अब मोक्ष नहीं, मौत की कहानी कह रही।
अजय कुमार शुक्ल, कुशीनगर। मैं हूं मोक्षदायिनी नारायणी। हिमालय की गोद से निकलकर सदियों से जीवन, आस्था और सभ्यता को सींचती आई हूं। मेरे जल में शालिग्राम के रूप में भगवान विष्णु की आस्था बसती है तो मेरी ही धारा बुद्ध की निर्वाण स्थली कुशीनगर की धरती को स्पर्श करती हुई बिहार की ओर बढ़ जाती है। मेरे किनारों ने सनातन और बौद्ध विरासत के अनगिनत अध्याय देखे हैं। मगर आज पहली बार लगता है कि मेरी लहरों में पानी कम और त्रासदी का दर्द अधिक बह रहा है।
नेपाल के हिमालयी क्षेत्र से उठा त्रासदी का मंजर जब मेरी धारा तक पहुंचा तो मैं भी कांप उठी। 26 अगस्त से अब तक मेरे आंचल में केवल लकड़ी, पहाड़ों की मिट्टी नहीं आई। साथ बहकर आए हैं उजड़े घरों के निशान, गृहस्थी के सामान और उन परिवारों के अरमान, जिन्हें शायद यह भी पता नहीं कि उनके अपने किस दिशा में बह गए।
कुशीनगर में मेरे तट पर अब सन्नाटा पसरा है। मेरी लहरें किनारे से टकराती हैं और फिर लौट जाती हैं, लेकिन अपने पीछे सवाल छोड़ जाती हैं। यह टूटा हुआ खिलौना किस बच्चे का है। वह घर की चौखट, बिस्तर, सोफा, गैस सिलेंडर और दूसरे सामान किस परिवार की आखिरी निशानी हैं।
मेरी गोद में मिले शव इस सवाल को और भारी कर देते हैं। पहचान से दूर हो चुके इन चेहरों को देखकर लगता है जैसे किसी मां की आंखें अपने बेटे को तलाश रही होंगी, किसी पत्नी ने पति के लौटने की राह देखी होगी और किसी बच्चे ने पिता के आने की उम्मीद में दरवाजे की ओर देखा होगा। लेकिन वे नहीं लौटे।
उनकी तलाश अब मेरी धारा तक आकर ठहर गई है। मैं नारायणी हूं। मुझे मोक्षदायिनी कहा जाता है। मेरे जल से लोगों की आस्था जुड़ी है। मगर इस बार मेरी लहरों ने मोक्ष की कथा नहीं, मौत और बिछड़ने की कहानी अपने साथ ढोई है। नेपाल की तबाही का जो मलबा मेरी धारा में आया, उसने मेरा सरस सलिला वाला रूप जैसे ढक दिया है।
चंद दिनों पहले तक मेरे किनारे आस्था के दीप जलते थे। स्नान करने वालों की आवाजें गूंजती थीं। किसान मेरी धारा को जीवन की उम्मीद की तरह देखते थे। आज उन्हीं किनारों पर लोग दूर तक मेरी ओर देखते हैं.. शायद कोई अपना मिल जाए, शायद कोई पहचान सामने आ जाए, शायद बहकर आया कोई सामान किसी परिवार की कहानी कह दे। मेरे लिए सबसे कठिन वह क्षण है, जब कोई किनारे पर पड़े किसी सामान को पहचानने की कोशिश करता है।
उसकी आंखों में उम्मीद होती है और चेहरे पर डर। वह उसे उलट-पलटकर देखता है। फिर निराश होकर पीछे हट जाता है। मैं सब देखती हूं। मेरे पास लौटाने को बहुत कुछ है, लेकिन जिन अपनों को ये लोग तलाश रहे हैं, उन्हें मैं कहां से लौटाऊं।
मैंने त्रासदी के उस वेग को भी महसूस किया है, जिसने नेपाल में घरों को उजाड़ा। मैं अंदाजा लगा सकती हूं कि, जब पानी अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को निगल रहा होगा, तब वहां चीख कितनी भयावह रही होगी। मेरे आंचल में उजड़ी गृहस्थी के सामान हैं तो उसके साथ बिखरे अरमान भी हैं।
यह भी पढ़ें- कुशीनगर: नेपाल बाढ़ के बाद नारायणी नदी में मिले शव, चेहरे और सामान से नहीं हो सकी पहचान; सुरक्षित किए गए DNA सैंपल
शव हैं तो उनके साथ उन परिवारों की कहानियां भी हैं, जिनका इंतजार शायद कभी खत्म नहीं होगा। मैं बहती रहूंगी। पहाड़ों से मैदानों तक, नेपाल से बिहार की ओर। सदियां बदलेंगी, मेरे किनारे बदलेंगे, लोग बदलेंगे। लेकिन इस बार मेरी धारा पर लिखी नेपाल त्रासदी की कहानी इतनी आसानी से नहीं मिटेगी।
