नवजात शिशुओं में पनप रही कौन-सी बीमारी? AI आधारित खास मोबाइल एप से तुरंत पता चलेगा
लोहिया संस्थान के बाल रोग विभाग ने नवजात शिशुओं में लिवर की गंभीर बीमारियों का शुरुआती पता लगाने के लिए एक एआई-आधारित मोबाइल ऐप विकसित किया है। ...और पढ़ें

नवजात शिशुओं में लिवर रोग का पता लगाएगा एआई आधारित मोबाइल एप।

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जागरण संवाददाता, लखनऊ। चिकित्सा क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) का उपयोग लगातार बढ़ रहा है और अब यह नवजात शिशुओं की सेहत के लिए भी उम्मीद की नई किरण बनकर उभरा है।
लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के बाल रोग विभाग ने एक ऐसा एआइ आधारित मोबाइल एप विकसित किया है, जो नवजात शिशुओं में लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारियों का शुरुआती चरण में ही पता लगाने में सक्षम है। बुधवार को यह एप लांच किया जाएगा।
एआइ तकनीक से होगी सटीक जांच
संस्थान के निदेशक प्रो. सीएम सिंह के अनुसार, नवजात शिशुओं में पीलिया (जांडिस) एक सामान्य स्थिति होती है, लेकिन कई बार यह गंभीर लिवर रोग जैसे “बिलियरी एट्रेसिया” का संकेत भी हो सकता है।
इस बीमारी में लिवर से पित्त के बहाव में रुकावट आ जाती है, जिससे शिशु का स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ सकता है। समय पर पहचान और उपचार न मिलने पर यह जानलेवा भी साबित हो सकती है। यह मोबाइल एप आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इमेज प्रोसेसिंग तकनीक का उपयोग करता है।
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माता-पिता या स्वास्थ्यकर्मी शिशु के मल (स्टूल) की फोटो एप में अपलोड करते हैं, जिसके बाद एप रंग और पैटर्न का विश्लेषण करता है। यदि मल का रंग सामान्य से अलग होता है, तो एप संभावित लिवर समस्या का संकेत देता है और तुरंत डाक्टर से संपर्क करने की सलाह देता है।
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शुरुआती पहचान से बढ़ेगी उपचार की सफलता
संस्थान में पीडियाट्रिक गैस्ट्रोलाजिस्ट डा. पीयूष उपाध्याय ने बताया कि “बिलियरी एट्रेसिया” जैसी बीमारियों में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि जीवन के पहले 6-8 सप्ताह के भीतर पहचान हो जाए तो सर्जरी के जरिए शिशु को बचाया जा सकता है।
एआइ आधारित यह एप इसी महत्वपूर्ण समय में चेतावनी देकर नवजातों के जीवन बचाने में मदद कर सकता है। यह एप खासतौर पर उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी है, जहां विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी है। मोबाइल फोन के बढ़ते उपयोग के कारण यह तकनीक गांवों तक आसानी से पहुंच सकती है।
आशा कार्यकर्ता और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के कर्मचारी भी इसका उपयोग कर सकेंगे। एप की एक खास विशेषता इसकी बहुभाषी उपलब्धता है। इसे 40 भाषाओं में तैयार किया गया है। जिसमें भारतीय 22 और 18 विदेशी भाषाएं हैं। देश-विदेश में अधिक से अधिक लोगों तक इसकी पहुंच सुनिश्चित हो सके।
पीडियाट्रिक विभाग में डा. केके यादव का कहना है कि इस तरह के डिजिटल टूल को सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के साथ जोड़कर बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है। इससे नवजात शिशुओं की नियमित स्क्रीनिंग संभव होगी और गंभीर बीमारियों की समय रहते पहचान की जा सकेगी।