'भाई तो बहुत बने लेकिन सब ने दिया धोखा, उमाशंकर हमेशा रहे साथ', अंतिम दर्शन पर भावुक हुईं मायावती
बसपा प्रमुख मायावती अपने इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह के अंतिम दर्शन पर भावुक हो गईं, उनकी निष्ठा और वफादारी की सराहना की। उन्होंने कहा कि उमाशंकर ने कभ ...और पढ़ें
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बसपा प्रमुख मायावती।
HighLights
मायावती ने उमाशंकर सिंह को निष्ठावान और वफादार बताया।
कहा, अनुसूचित जाति को छोड़कर सबने धोखा दिया।
उमाशंकर के बेटे को राजनीति में आगे बढ़ाने का आश्वासन।
राज्य ब्यूरो, लखनऊ। अपने इकलौते विधायक के अंतिम दर्शन के मौके पर भावुक बसपा प्रमुख मायावती ने उमाशंकर सिंह को निष्ठावान और वफादार बताते हुए कहा कि उनके भाई तो बहुत बने लेकिन एससी (अनुसूचित जाति) को छोड़कर सब धोखा देकर चले गए।
उमाशंकर ने उन्हें कभी धोखा नहीं दिया। सगी बहन की तरह मानने वाले उमाशंकर उन्हें राखी बांधते रहे और वह भी पूरी तरह से परिवार के साथ खड़ीं हैं। मायावती ने आश्वासन दिया कि परिवार चाहेगा तो उमाशंकर के बेटे को वह राजनीति में आगे बढ़ाएंगी।
पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा के 403 प्रत्याशियों में से एक मात्र चुनाव जीतने वाले उमाशंकर सिंह वर्ष 2012 में पहली बार विधायक चुने गए थे। बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट से तीसरी बार चुनाव जीते उमाशंकर, बसपा प्रमुख मायावती के सदैव विश्वासपात्र बने रहे।
अंतिम दर्शन के लिए आवास पर पहुंची मायावती
उमाशंकर की निष्ठा को देखते हुए बसपा प्रमुख उनके परिवार के शादी समारोह से लेकर बीमारी के दौरान उनके गोमतीनगर स्थित आवास पर भी गईं। गुरुवार को अंतिम दर्शन के लिए आवास पर पहुंची मायावती ने कहा कि आमतौर पर कारोबारी सत्ता परिवर्तन पर पार्टियां बदल लेते हैं लेकिन पार्टी के उतार-चढ़ाव के बावजूद उमाशंकर ने कभी उन्हें धोखा नहीं दिया।
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अपनी सगी बहन मानते हुए प्रति वर्ष राखी बांधने का जिक्र करते हुए मायावती बोलीं कि भाई तो बहुत बने लेकिन अनुसूचित जाति (खासतौर से दलित समाज के लोग मायावती को बहनजी ही कहते हैं) को छोड़कर सब धोखा देकर चले गए।
उल्लेखनीय है कि लगभग ढाई दशक पहले वर्ष 2002 में मायावती ने भाजपा नेता लालजी टंडन को अपना मुंहबोला भाई बताते हुए उन्हें चांदी की राखी बांधी थी। उस समय भाजपा के सहयोग से ही मायावती, मुख्यमंत्री थी। हालांकि, बाद में समर्थन वापसी के साथ ही वह सत्ता से बाहर हो गईं थीं।
लगातार गिरा बसपा का ग्राफ
दरअसल, दो दशक पहले अकेले दम पर बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा का ग्राफ पिछले डेढ़ दशक के दौरान लगातार गिरता ही रहा है। वर्ष 2012 में सत्ता से बाहर होने के बाद वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के शून्य पर सिमटने के बाद से कई बड़े नेताओं ने मायावती का साथ छोड़ सपा, भाजपा या कांग्रेस का दामन थाम लिया है।
लगातार खिसकते जनाधार का ही नतीजा रहा पिछले लोकसभा चुनाव में भी शून्य पर रही बसपा का पिछले विधानसभा चुनाव में भी बेहद खराब प्रदर्शन रहा था। एक मात्र उमाशंकर ही थे जो वर्ष 2012 में पहली बार विधायक चुने जाने से लेकर अंतिम समय तक मायावती से जुड़े रहे।
विधायक बनने से पहले से सरकारी निर्माण कार्य के ठेके लेने वाले उमाशंकर को विधायक रहते सरकारी ठेका लेने का दोषी पाए जाने पर वर्ष 2017 में विधायकी भी गंवानी पड़ी थी।
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हालांकि, वर्ष 2017 के चुनाव में उमाशंकर दूसरी बार फिर विधायक चुन लिए गए। वर्ष 2022 में अठारहवीं विधानसभा के लिए हुए चुनाव में उमाशंकर हैट-ट्रिक लगाने में कामयाब रहे लेकिन दलबदल न करते हुए वह विधानसभा सदन में अकेले ही मायावती की आवाज बने रहे।