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    संत प्रेमानंद का गुरु पूर्णिमा संदेश: भक्तों को बताया भगवत प्रेम और पवित्र वाणी का महत्व, 5 राज्यों के दीक्षित शिष्य पहुंचे

    Updated: Tue, 28 Jul 2026 08:57 AM (GMT+05:30)

    संत प्रेमानंद ने गुरु पूर्णिमा पर भक्तों को भगवत प्रेम और वाणी की पवित्रता का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य भगवत साक्षात्कार ह ...और पढ़ें

    वृंदावन में गुरु पूर्णिमा महोत्सव पर श्रीराधा केलिकुंज में पादुका पूजन को पहुंचे श्रद्धालुओं की भीड़। - फोटो: जागरण।

    वृंदावन में गुरु पूर्णिमा महोत्सव पर श्रीराधा केलिकुंज में पादुका पूजन को पहुंचे श्रद्धालुओं की भीड़। - फोटो: जागरण।

    HighLights

    1. मनुष्य जीवन का उद्देश्य भगवत प्रेम प्राप्ति है

    2. वाणी को पवित्र रखकर निरंतर ईष्ट चिंतन करें

    3. सभी से प्रेम और निष्कपट व्यवहार करना चाहिए

    संवाद सहयोगी, वृंदावन (मथुरा)। गुरु पूर्णिमा महोत्सव में दीक्षित शिष्यों को प्रवचन देते हुए संत प्रेमानंद ने सोमवार को कहा मनुष्य का उद्देश्य ही भगवत प्रेम प्राप्ति है, भगवत साक्षात्कार है। समस्त दुखों और विकारों से मुक्त होना ये केवल मनुष्य जीवन में ही संभव है।

    कैसे हम नवनिकुंज के प्रेमरस को प्राप्त करें, सेवकजी महाराज कहते हैं कि यदि हमारे हृदय में प्रीति नहीं है तो हम मुख से कुछ भी चर्चा करते रहें लाभ नहीं मिलेगा। लाभ तभी मिलेगा, जब हमारे अंदर प्रीति हो। प्रीति कैसे होगी? जब हमारा निरंतर ईष्ट चिंतन हो।

    वाणी को बहुत संभालकर बोलना चाहिए

    जहांगीरपुर स्थित यमुना विहार कुंज आश्रम में चल रहे गुरू पूर्णिमा महोत्सव में सोमवार को संत प्रेमानंद ने कहा, वाणी को बहुत संभालकर बोलना चाहिए, इससे पाप भी बन जाता है। जब हम दूसरों की निंदा करते हैं तो हमें कुछ मिलता नहीं है। बल्कि हमारा पुण्य नष्ट होता है और हमारे सिर पर पाप की गठरी बनती है। वृंदावन में विराजमान सहचरियों के मध्य में प्रिया प्रियतम की ही बात करनी चाहिए।

    सत्य बोलो, मृदु और हितकर बोलो

    संत प्रेमानंद महाराज ने कहा कि सत्य बोलो, मृदु बोलो, हितकर बोलो, वाणी को पवित्र रखो, अगर वाणी पवित्र है तो आपका चित्त वहीं लगेगा, जहां वाणी लगती है। वाणी से हम यदि प्रभु की चर्चा करते हैं असत्य नहीं बोलते, दुखद नहीं बोलते, कठोर, अश्लील वचन नहीं बोलते तो हमारा चित्त पवित्र होने लगेगा। पवित्र चित्त की पहचान ये है कि ईष्ट में निरंतर वृत्ति फेंकना, एक एक वृत्ति यदि हमारे ईष्ट में लग रही है तो हमारा चित्त पवित्र हो रहा है और हमारा मन हर समय ईष्ट का सुमिरन करे, चित्त में वही वृत्ति है, मुख में यही नाम है, तो यही कृपा हरिवंश की होती है।

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    प्रेमानंद महराज ने कहा, हमें सबसे प्यार करना चाहिए

    संत प्रेमानंद ने कहा हमें सबसे प्यार करना चाहिए, सबसे प्रेम से बोलना चाहिए, सबमें भगवान विराजमान हैं और प्रिया प्रियतम विराजमान हैं। चेतन, अचेतन में सबमें राधाकृष्ण ही विराजमान हैं, सबसे प्रेम से बोलो। लेकिन, किसी से स्वार्थ का, छल कपट का व्यवहार मत करो, निष्पकट का व्यवहार करो।

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    यहां के शिष्य पहुंचे

    सोमवार को यमुना पार के यमुना विहार कुंज आश्रम में गुरु पूर्णिमा महोत्सव पर संत प्रेमानंद के दर्शन व पूजन के लिए राजस्थान, हिमाचल, असोम, महाराष्ट्र, तेलंगाना के दीक्षित शिष्य पहुंचे। वृंदावन में श्रीराध केलिकुंज में भी हजारों शिष्यों ने पादुका पूजन किया।

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