संत प्रेमानंद जी के प्रवचन- अगर मन में परस्त्री के सहवास की भावना आई तो…; बताया भगवत प्राप्ति का मार्ग
संत प्रेमानंद ने गुरु पूर्णिमा महोत्सव में कहा कि मनुष्य शरीर भगवान की अपार कृपा से मिलता है, जिसे भगवतकृपा में बिताना चाहिए। ...और पढ़ें

HighLights
मनुष्य शरीर भगवान की अपार कृपा का फल है।
साधना का पहला लक्षण है शांति और क्षमा।
अधर्म से वैराग्य कर निरंतर नामजप करें।
जागरण संवाददाता, वृंदावन। संत प्रेमानंद ने कहा जब भगवान की अपार कृपा होती है तो जीव को मनुष्य शरीर मिलता है, कृपा बढ़ती है तो साधु समागम मिलता है। कृपा का परिपूर्ण स्वरूप प्रकाशित होने पर साधना प्राप्त होती है। साधना का फल है प्रेम, अपने श्यामाश्याम के चरणों का निरंतर चिंतन होना, निरंतर नामजप करना, निरंतर लीलागुण गायन करना, अंदर ही अंदर चिंतन चलना यही फल है साधना का।
यमुना पार जहांगीरपुर में यमुना विहार कुंज आश्रम में गुरु पूर्णिमा महोत्सव में रविवार को उप्र व ब्रजमंडल के भक्तों को संत प्रेमानंद ने उपदेश दिए। कहा, हमारी साधना परिपक्व होने का पहला लक्षण शांति है, जितनी विपत्ति आए, दुख आए, अपमान हो, निंदा हो, अशांत नहीं होना ही अध्यात्म की पहली सीढ़ी है।
क्षमा और क्षमावान ही महान है, न कि क्रोध करने, दंड देने या विरोध करने वाला। जो हमें दंड दे, वे हमारे पापों को नष्ट करने व बड़े कृपालु हैं। हमें उनसे द्रोह नहीं करना चाहिए।
भगवत प्राप्ति के पांच मार्ग
संत प्रेमानंद ने बताया कि आध्यात्म की साधना का पहला लक्षण क्षमावान और शांति है। ये तभी हो सकता है जब आप गुरुकृपा पात्र बन गुरुमंत्र व नामजप करते हैं। एक भी मिनट हम अपने प्रभु को न भूलें, ये दूसरी आध्यात्म की सीढ़ी है। हर समय सत्संग करें, नाम संकीर्तन करें, नामजप करें।
घर परिवार की सेवा में हैं तो सबको सुख प्रदान करने की भावना रखें, अधर्म के भोगों से वैराग्य, गृहस्थ में हैं तो सिर्फ अपनी पत्नी से अनुराग करें, वह भी भगवत भाव से।
अगर परस्त्री के सहवास की भावना व काम भाव से प्रेरित होकर गलत चिंतन, गलत दृष्टि, गलत आचरण किया तो नर्क जाना पड़ेगा। काम, क्रोध नरक का मार्ग है नरक महान दुखदाई है, इसलिए अधर्म के भोगों से वैराग्य करो, कोई भी नशा मत करो, शराब मत पियो, परस्त्री गमन की इच्छा पूर्ण त्याग कर दो नहीं तो दुर्गति हो जाएगी।
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अधर्म के आचरणों से वैराग्य करो, मांस मत खाओ, पराए धन की भवना, परद्रोह का त्याग करो, तीसरी भूमिका मान शून्यता होनी चाहिए, हमें सम्मान की चाह नहीं होनी चाहिए। लोग हमें प्रणाम करें, सम्मान करें, ऐसी भावना हमारे अंदर रही तो हम आध्यात्म की तीसरी भूमिका पर नहीं पहुंच पाएंगे।
चौथी आध्यात्म की भूमिका इसी जन्म में भगवत प्राप्ति होगी ये दृढ़ निश्चय होना चाहिए। पांचवीं भूमिका में नाम में रुचि होकर उत्साह सहित हर पल नाम जप करना चाहिए। ये भूमिका हमारे अंदर जागृत होनी चाहिए। एक क्षण के लिए नाम छूटे तो भारी क्लेश मन में होने लगता है। ऐसा प्रतीत होना चाहिए। तभी हमारा जीवन सार्थक होगा।

यमुना विहार आश्रम में चल रहे गुरु पूर्णिमा महोत्सव में रविवार को उप्र व ब्रजमंडल के हजारों दीक्षित शिष्य संत प्रेमानंद के दर्शन व पूजन करने को पहुंचे थे।
उधर, श्रीराधा केलिकुंज में भी मनाए जा रहे गुरु पूर्णिमा महोत्सव में सुबह से ही देशभर के भक्तों ने संत प्रेमानंद के पादुका पूजन कर अपने गुरु के प्रति आस्था समर्पित की।
श्रीराधा केलिकुंज पर भी भक्तों की भीड़ पादुका पूजन के लिए पहुंच रही है। सोमवार को यमुना विहार कुंज आश्रम में संत प्रेमानंद के दर्शन व पूजन को राजस्थान, हिमाचल, असोम, महाराष्ट्र, तेलंगाना के दीक्षित शिष्य पहुंचेंगे।
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