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    कारगिल युद्ध: मदद आने तक 8 घायल जवानों ने भी दुश्मन के सामने नहीं टेके घुटने, जगदीश की अदम्य शौर्य गाथा

    Updated: Sun, 26 Jul 2026 08:32 AM (GMT+05:30)

    कारगिल युद्ध के नायक सूबेदार जगदीश नागर ने 30 अप्रैल 1999 को एक मुठभेड़ में घायल होने के बावजूद अपने साथियों के साथ दुश्मन को आगे नहीं बढ़ने दिया। गौत ...और पढ़ें

    सूबेदार जगदीश नागर की बहादुरी। जागरण

    सूबेदार जगदीश नागर की बहादुरी। जागरण

    HighLights

    1. सूबेदार जगदीश नागर ने कारगिल युद्ध में अदम्य साहस दिखाया।

    2. घायल होने पर भी दुश्मन को एक इंच आगे नहीं बढ़ने दिया।

    3. उनकी कहानी नई पीढ़ी को देशभक्ति का पाठ पढ़ाती है।

    अजब सिंह भाटी, ग्रेटर नोएडा। सरहद पर जब गोलियां ताबड़तोड़ बरस रही हों, साथी गिर रहे हो और मदद दूर हो, तब भी तिरंगे को झुकने न देना। कारगिल युद्ध की ऐसी ही एक शौर्य गाथा गौतमबुद्ध नगर के इमलियाका गांव से जुड़ी है।

    1999 के कारगिल युद्ध के हीरो सूबेदार जगदीश नागर की बहादुरी आज भी हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देती है। इमलियाका गांव निवासी सूबेदार जगदीश नागर उस समय कंपनी में हवलदार मेजर के पद पर तैनात थे।

    एक अफसर समेत कुल 12 जवान शामिल थे

    30 अप्रैल 1999 की रात अंधेरे का फायदा उठाकर उनकी यूनिट ने दुश्मन की एक चौकी को तबाह कर आगे बढ़ने का फैसला लिया। उनकी टुकड़ी में एक अफसर समेत कुल 12 जवान शामिल थे। भोर करीब साढ़े पांच बजे अचानक पाकिस्तानी घुसपैठियों ने उनकी टुकड़ी पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी।

    हमले में अफसर समेत चार जवान मौके पर ही वीरगति को प्राप्त हो गए। बचे हुए सभी आठ जवान भी दुश्मन की गोली से घायल हो गए। शरीर लहूलुहान था, लेकिन हौसले बुलंद थे। मदद आने तक इन घायल जवानों ने फौलाद की तरह मोर्चा संभाले रखा और दुश्मन को एक इंच भी आगे नहीं बढ़ने दिया।

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    घायल अवस्था में भी जवान डटे रहे

    सूबेदार जगदीश नागर बताते हैं, दुश्मन को हमारी गतिविधियों की भनक न लगे इसलिए हम ज्यादातर मूवमेंट रात में ही करते थे। उस दिन भी रात में ऑपरेशन कर हम आगे बढ़े थे, लेकिन भोर होते ही दुश्मन ने हमें घेर लिया। घायल अवस्था में भी जवान डटे रहे। कुछ देर बाद जब अतिरिक्त मदद पहुंची तो संयुक्त कार्रवाई में दुश्मनों को नेस्तनाबूद कर दिया गया।

    देशभक्ति का जज्बा

    इस मुठभेड़ में जगदीश नागर के सीधे पैर की दो उंगलियां भी दुश्मन की गोली से जख्मी हो गईं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। 2006 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी देशभक्ति का जज्बा उनके अंदर आज भी उतना ही जिंदा है। वे कहते हैं कि 1971 की जंग हो या 1999 का कारगिल, पाकिस्तान को हर बार भारतीय सेना के पराक्रम के सामने मुंह की खानी पड़ी है।

    युद्ध की यादें ताजा करते हुए सूबेदार नागर की आंखें नम हो जाती हैं। वे कहते हैं कि उन पलों को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। साथियों को खोने का दर्द और देश के लिए लड़ने का गर्व दोनों एक साथ महसूस होते हैं। गांव के लोग भी उन्हें भारत के वीर सपूत कहकर सम्मान देते हैं।

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    कारगिल के 26 साल बाद भी जगदीश नागर की कहानी नई पीढ़ी को यह सिखाती है कि वर्दी का मतलब सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि देश के लिए जान देने और जान लेने का जज्बा होता है।