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    नोएडा का पुराना पैटर्न: हादसे होते रहे, जिम्मेदार बचते रहे; युवराज केस में क्या बदलेगा ‘जांच का इतिहास’?

    Updated: Mon, 26 Jan 2026 10:20 AM (IST)

    सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की डूबने से मौत के बाद गठित एसआईटी ने जांच पूरी कर ली है। हालांकि, नोएडा में पिछली कई एसआईटी और सीबीआई जांचों में किसी ...और पढ़ें

    नोएडा में जांच की आंच में आज तक नहीं झुलस सका कोई भी जिम्मेदार। जागरण ग्राफिक्स

    नोएडा में जांच की आंच में आज तक नहीं झुलस सका कोई भी जिम्मेदार। जागरण ग्राफिक्स

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    कुंदन तिवारी। जागरण नोएडा। सेक्टर-150 स्थित एससी 02 ए पर माल के बेसमेंट के लिए खोदे गए प्लाट में भरे पानी में डूबने से साफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत हो गई थी। इसको लेकर लोगों में नाकाम सिस्टम को लेकर भारी नाराजगी है।

    घटना में जिम्मेदारों पर कार्रवाई के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एसआइटी का गठन किया था। एसआइटी ने पांच दिन में अपनी जांच पूरी कर ली है। अब रिपोर्ट शासन के समक्ष प्रस्तुत होनी है। शहर में चर्चाओं को बाजार गर्म हो गया है।

    शहरवासियों की नजर इस बात पर लगी है कि एसआइटी जांच किसी परिणाम तक पहुंच पाएगा या पिछले कई जांचों की तरह इसका कोई नतीजा नहीं निकलेगा। नोएडा में पूर्व में कई मामलों में एसआइटी जांच हुई है, लेकिन कभी किसी पर कार्रवाई नहीं हुई है।

    युवराज मामले में सरकारी सिस्टम में आपसी समांजस का अभावा देखने को मिला है। पुलिस, प्रशासन, फायर विभाग, प्राधिकरण, एसडीआरएफ के बीच कही तालमेल नहीं रहा। इसका परिणाम यह रहा कि एक युवक की उसके पिता के सामने ही मौत हो गई, सब तमाशबीन बने रहे।

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    एसआइटी की पिछली जांचों की स्थिति 

    केस एक : ट्विन टावर प्रकरण वर्ष 2012 से शुरू हुआ, दस वर्ष बाद 2022 में खत्म हो गया। इसमें सुपरटेक एमराल्ड कोर्ट सोसायटी में एपेक्स व सियान नाम के दो टावर को ध्वस्त किया गया, लेकिन ध्वस्तीकरण के चार वर्ष बाद भी एसआइटी ने जिन 30 लोगों को प्रकरण का जिम्मेदार ठहराया था। उसमें से एक पर भी कार्रवाई नहीं हो सकी।

    केस दो : किसान अतिरिक्त मुआवजा वितरण मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एसआइटी का गठन किया गया। एक बार सुप्रीम कोर्ट ने ही एसआइटी की जांच को खारिज कर दिया। दोबारा जांच हुई तो सुप्रीम कोर्ट संतुष्ट नहीं दिखा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नई एसआइटी का गठन हुआ जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, लेकिन किसी जिम्मेदारी पर आज तक कार्रवाई नहीं हो सकी।

    केस तीन : ग्रेटर नोएडा वेस्ट में औद्योगिक विकास के लिए आरक्षित जमीन पर सरकार और एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की अनुमति के बिना ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों के लिए जमीन बेच दी गई। बिना अनुमति के नक्शा बदल दिया गया। दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई के लिए एसआईटी बनी। जांच हुई, लेकिन परिणाम शून्य।

    CBI के केसों की स्थिति 

    केस एक : यादव सिंह प्रकरण में वर्ष 2015 में सीबीाआइ ने नोएडा प्राधिकरण के सेक्टर-21 ए स्थित नोएडा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम घोटाले की जांच की। पहली चार्ज शीट में नौ पर कार्रवाई के लिए प्राधिकरण को लिखा गया, उसमें से कुछ लोग इधर उधर तबादला होकर चले गए, कुछ सेवानिवृत्त हो गए।

    प्राधिकरण ने न तो खुद कार्रवाई की और न ही शासन ने कार्रवाई की जहमत उठाई। इसी प्रकरण में सीबीआइ ने 21 लोगों की जिम्मेदारी तय की थी। उसका क्या हुआ आज तक किसी का अता पता नहीं।

    केस दो : वर्ष 2008 में आरुषि कांड हुआ, इसका हश्र भी कुछ इसी प्रकार से हुआ,। देश विदेश तक घटना की चर्चा हुई। पिता डा राजेश तलवार व मां नूपुर तलवार दोनों को जांच एजेंसियों ने दोषी ठहराया कर जेल भेजा, लेकिन सबूतों के आभाव में बरी हो गए, लेकिन इस केस में किसी भी जिम्मेदारी पर कोई भी कार्रवाई नहीं हो सकी।

    केस तीन : सबसे चर्चित निठारी कांड माना जाता है। इसे एक सीरियल मर्डर कांड भी कहा जाता है। घटना को 2006 में सेक्टर -31 स्थित डी- 5 व्यवसायी मोनिंदर सिंह पंढेर के घर को बताया गया, सुरेंद्र कोहली को भी दोषी ठहराया गया।

    यह केस करीब 20 वर्ष तक चर्चा में रहा, लेकिन सबूतों के अभाव में इस केस में जांच एजेंसियों की ओर से जिन्हें दोषी बनाया गया, उन्हें अदालत से बरी करना पड़ा।

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