Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    रूटोनिक तकनीक से बढ़ाई जाएगी फसलों की उत्पादकता, मिलेगी स्वस्थ और केमिकल-मुक्त उपज

    Updated: Sun, 21 Jun 2026 05:05 PM (GMT+05:30)

    रूटोनिक तकनीक, जो खेजड़ी के पौधे की जड़ से विकसित एक विशेष फंगस पर आधारित है, फसलों की उत्पादकता 20-40% बढ़ाएगी। यह तकनीक रासायनिक उर्वरकों का उपयोग घ ...और पढ़ें

    रूटोनिक तकनीक से फसल रहेगी स्‍वस्‍थ।

    रूटोनिक तकनीक से फसल रहेगी स्‍वस्‍थ।

    HighLights

    1. खेजड़ी के फंगस से विकसित रूटोनिक तकनीक।

    2. फसलों की उत्पादकता 20-40% तक बढ़ेगी।

    3. रासायनिक उर्वरक 20-25% कम होंगे, फसलें स्वस्थ।

    चेतना राठौर, नोएडा। राजस्थान के थार मरुस्थल में उगने वाले खेजड़ी के पौधे की जड़ों में पाई जाने वाली विशेष फफूंद (फंगस) से विकसित की गई रूटोनिक तकनीक किसानों के लिए नई उम्मीद जगा रही है। इस फंगस के उपयोग से टमाटर, गेहूं, आलू सहित विभिन्न फसलों की उत्पादकता में 20 से 40 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकेगी। इसकी खास बात यह है कि फसलों की उत्पादकता बढ़ाने में उपयोग किए जाने वाले केमिकल फर्टिलाइजर का प्रतिशत 20 से 25 घटा देगा। इससे फसलें केमिकल मुक्त हो सकेंगी और स्वस्थ भी रहेंगी।

    यह तकनीक एमिटी यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट आफ माइक्रोबियल टेक्नोलाजी निदेशक डा. अमित सी खर्कवाल द्वारा विकसित की गई है, जिसे केंद्र सरकार से पेटेंट भी मिल चुका है। साथ ही इसके व्यावसायीकरण की दिशा में भी कदम बढ़ गए हैं। ताइवान की एक कंपनी समेत कुल छह कंपनियों को इस तकनीक को ट्रांसफर किया गया है, जबकि नोएडा की कंपनी ने भी इसे खरीदा है। यह किसानों को करीब एक हजार रुपये की लागत में एक किलो ग्राम उपलब्ध हो सकेगी, जिससे खेती की लागत घटेगी और पर्यावरण पर पड़ने वाला दबाव भी कम होगा।

    मिट्टी और पौधों को मिलेंगे कई लाभ 

    रूटोनिक फंगस मिट्टी में फास्फोरस को अधिक घुलनशील बनाता है, जिससे पौधों को पोषक तत्व आसानी से उपलब्ध होते हैं। इसके अलावा यह पौधों की पानी अवशोषित करने की क्षमता बढ़ाता है। मिट्टी की सूखा सहनशीलता को मजबूत करता है और अधिक तापमान जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने में भी मदद करता है।

    WhatsApp Image 2026-06-03 at 1.12.16 PM(2)

    इस तकनीक का आधार पिरिफार्मोस्पोरा इंडिका रूटोनिक नामक फंगस है, जिसे विज्ञानी समुदाय में जादुई फंगस के रूप में भी जाना जाता है। यह फसलों की वृद्धि और उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें जैविक एवं अजैविक तनावों जैसे रोग,सूखा और अन्य प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रति अधिक सहनशील बनाता है।

    खबरें और भी

    एक एकड़ खेत के लिए एक किलो फंगस की जरूरत 

    इस फंगस को फसल के बीज और मिट्टी में मिलाकर इस्‍तेमाल कर सकते हैं या इसके पाउडर को फसलों पर छिड़काव किया जा सकता है। इसका छिड़काव हर सीजन में फसलों पर करना होगा। एक सीजन में एक फसल के लिए एक किलो फंगस ही पर्याप्‍त होगा। वैसे मात्रा फसल पर निर्भर करती है, कि कितनी आवश्‍कयता होगी।

    जैसे गेहूं, आलू और गन्ना की एक एकड़ फसल में एक किलो ग्राम, टमाटर और अन्य सब्जियों में सौ ग्राम से कम, ज्वार,बाजरा जैसी मोटे अनाज की फसलों में ढाई सौ ग्राम ही पर्याप्‍त है। यह बीज की जड़ों को कई गुना बढ़ाकर पैदावार बढ़ाएगा।

    इस तरह तैयार हुई तकनीक 

    थार मरूस्थल के बीस पौधों पर शोध किया जिनमें से खेजड़ी के पौधे की जड़ से ऐसा फंगस मिला, जो जड़ के बिना भी पैदावार को बढ़ाने में सक्षम था। मरूस्थल की भयानक गर्मी और पानी की कमी में उगने वाले इस पौधे की जड़ से फंगस निकाला गया। और नोएडा स्थित एमिटी यूनिवर्सिटी की लेब्रोटरी में ट्रीट कर फंगस का कल्चर किया गया।

    इस फंगस देश के विभिन्‍न राज्‍यों में 148 फसलों पर डालकर टेस्टिंग की गई, जोकि सफल रही। राजस्थान, मध्यप्रदेश,उत्तर प्रदेश,हरियाणा,पंजाब सहित अन्य राज्यों की फसलों में उपयोग सफल परीक्षण रहा है।

    यह भी पढ़ें- अमरनाथ यात्रा-2026: अभेद्य सुरक्षा कवच के बीच श्रद्धालुओं का स्वागत, एंटी ड्रोन तकनीक और ऑपरेशन शिवा से तीर्थयात्री सुरक्षित

    यह भी पढ़ें- गुजरात: रेलवे में ओवरहेड इक्विपमेंट की ड्रॉन से निगरानी, AI से हवाई निरीक्षण तकनीक का विकास

    फसलों में अधिक कीटनाशक का उपयोग सेहत और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा था। इसको देखते हुए रूटोनिक फंगस की तकनीक पर काम किया। राजस्‍थान में खेजड़ी का पौधा बहुत होता है, इसकी जड़ें बहुत तेजी से बढ़ती हैं, तो आसानी से उपलब्‍धता हो जाती है। हां, फंफूद को जड़ से निकालने की तकनीक और प्रक्रिया है। निश्चित ही यह किसानों के लिए और पर्यावरण के लिए बेहद लाभदायक साबित होगी।

    -

    डॉ. अमित सी खर्कवाल, निदेशक, इंस्टीट्यूट आफ माइक्रोबियल टेक्नोलाजी, एमिटी यूनिवर्सिटी