पीलीभीत में डिजिटल इंडिया को लगा 'ताला'! करोड़ों खर्च, फिर भी ग्रामीण क्यों काट रहे ब्लॉक के चक्कर?
पीलीभीत में डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देने के लिए बने पंचायत सचिवालय निष्क्रिय पड़े हैं। करोड़ों खर्च के बावजूद, ग्रामीण आज भी आय, जाति और निवास प्रमाण ...और पढ़ें

पंचायत भवन में लटका ताला
HighLights
शासन ने पंचायत सचिवालय प्रतिदिन खोलने के दिए गए हैं निर्देश
जागरण संवाददाता, पीलीभीत। ग्रामीण क्षेत्रों को डिजिटल इंडिया से जोड़ने और स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक कार्यों को सुगम बनाने की सरकार की योजना धरातल पर दम तोड़ रही है। ग्रामीणों को सुविधा के लिए जिले में 720 पंचायत सचिवालयों को निर्माण कराया गया। अब इनमें कई सचिवालय बंद पड़े हैं।
हाल ही में शासन ने निर्देश दिए हैं कि सभी पंचायत सचिवालयों में पंचायत सहायक, लेखपाल और स्वयं सहायता समूह की महिलाओं की उपस्थिति अनिवार्य होगी, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। गेटों पर लटके जंग खाए ताले और पसरी धूल आदेशों को खुली चुनौती दे रहे हैं। ग्रामीण आज भी आय, जाति और निवास प्रमाण पत्र जैसे छोटे कार्यों के लिए तहसील और ब्लाक मुख्यालयों की धूल फांकने को मजबूर हैं।
ललौरीखेड़ा ब्लाक के गांव हरचुईया में स्थिति बेहद खराब है। यहां बना पंचायत सचिवालय अधिकांश समय ताले में ही कैद रहता है। आदेश थे कि ग्रामीण सचिवालय जाकर अपनी समस्याओं का समाधान पा सकेंगे, लेकिन हरचुईया में भवन के द्वार ही नहीं खुलते। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें नहीं पता कि यहां कौन अधिकारी बैठता है और कब बैठता है।
पंचायत सहायक और लेखपाल की अनुपस्थिति के कारण सरकारी योजनाओं की जानकारी गांव के अंतिम पायदान तक नहीं पहुंच पा रही है। लालपुर के पंचायत सचिवालय की हालत और भी बदतर है। यहां के सचिवालय भवन का उपयोग सरकारी काम के बजाय निजी कार्यों के लिए हो रहा है।
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सचिवालय के गेट के सामने उपले और गोबर के ढेर लगे हुए हैं, जो यह बताने के लिए काफी हैं कि यह भवन कितने समय से बंद है। मुख्य द्वार पर लगे ताले की जंग खुद गवाही दे रही है कि महीनों से किसी जिम्मेदार ने इसकी सुध नहीं ली है। सियाबाड़ी पट्टी में सरकारी धन का दुरुपयोग साफ दिखाई देता है। यहां पंचायत भवन का निर्माण तो बड़े जोर-शोर से करा दिया गया, लेकिन उद्घाटन के बाद से ही यहां सन्नाटा पसरा है।
लाखों की लागत से बना यह आलीशान भवन ग्रामीणों के किसी काम नहीं आ रहा। भवन के चारों ओर घास और गंदगी का साम्राज्य है।अधिकारियों की सक्रियता वाले निर्देश यहां पूरी तरह फेल नजर आ रहे हैं, क्योंकि इस भवन में न तो कभी लेखपाल पहुंचते हैं और न ही पंचायत सहायक। बीसलपुर ब्लाक के गांव सखिया में भी पंचायत भवन की स्थिति अलग नहीं है।
लाखों खर्च कर बनाई गई यह इमारत सिर्फ एक ढांचा बनकर रह गई है। यहां भी गेट पर लटका भारी-भरकम ताला ग्रामीणों की उम्मीदों को कुचल रहा है। डिजिटल पंचायत के दावे यहां के बंद दरवाजों के पीछे सिमट कर रह गए हैं। प्रशासनिक सुस्ती का आलम यह है कि अधिकारियों को यह तक जानकारी नहीं है कि सखिया का पंचायत भवन क्रियाशील है भी या नहीं।