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    'अगर वो एक डॉक्टर होता तो बच जाती कशिश...' करोड़ों के मेडिकल कॉलेज में इस कमी ने छीन ली छात्रा की जिंदगी

    Updated: Wed, 15 Jul 2026 10:54 PM (IST)

    पीलीभीत के सरकारी मेडिकल कॉलेज में वैस्कुलर सर्जरी की सुविधा न होने के कारण छात्रा कशिश की जान चली गई। करोड़ों के बजट के बावजूद, कॉलेज गंभीर मामलों मे ...और पढ़ें

    पीलीभीत मेड‍िकल काॅलेज

    पीलीभीत मेड‍िकल काॅलेज

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    1. हमले में गर्दन की कट गई थी मुख्य रक्त और उसकी सहायक वाहिकाएं

    जागरण संवाददाता, पीलीभीत। छात्रा कशिश को घायल अवस्था के दौरान करोड़ों रुपये के बजट से चल रहे स्वशासी राजकीय मेडिकल काॅलेज से संबद्ध जिला अस्पताल में ही सही इलाज नहीं मिल सका। उसके लिए आपात स्थिति में यहां न तो जरूरी सुपर स्पेशियलिटी सुविधा मिली और न समय पर विशेषज्ञ डाॅक्टर, नतीजा घायल छात्रा को बरेली के निजी अस्पताल रेफर करना पड़ा और वहां उसने दम तोड़ दिया।

    डाॅक्टरों ने बताया कि हमले में कशिश की गर्दन की मुख्य रक्त और उसकी सहायक वाहिकाएं कट गई थीं। अस्पताल में मौजूद डाक्टरों ने सेंट्रल लाइन लगाकर रक्त चढ़ाया, इंटुबेशन किया और हालत संभालने का प्रयास किया, लेकिन इतनी बड़ी घटना के बाद भी विभागाध्यक्ष डाॅ. जगदंबा प्रसाद इमरजेंसी में नहीं पहुंचे।

    कुछ देर बाद स्थिति और बिगड़ी तो एडवांस लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस से उसे बरेली के निजी मेडिकल काॅलेज एसआरएमएस अस्पताल भेजा गया। एंबुलेंस के साथ दो सीनियर, तीन जूनियर रेजिडेंट, एक ओटी टेक्नीशियन, दवाएं और ब्लड बैग भी भेजे गए, लेकिन उपचार के दौरान छात्रा की मौत हो गई।

    बताया कि छात्रा कशिश को तत्काल वैस्कुलर सर्जरी की जरूरत थी। मेडिकल काॅलेज में इस स्तर की सुविधा उपलब्ध न होने से उसे रेफर करना पड़ा। यही सवाल अब सबसे बड़ा बन गया है कि जब जिले में सरकारी मेडिकल काॅलेज करोड़ों की लागत से संचालित हो रहा है तो गंभीर ट्राॅमा और वैस्कुलर सर्जरी जैसे मामलों में मरीजों को निजी अस्पतालों का मुंह क्यों ताकना पड़ रहा है?

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    मेडिकल काॅलेज बनने का मकसद ही जिले के लोगों को उच्च स्तरीय इलाज देना था, लेकिन जटिल मामलों में आज भी रेफर की मजबूरी बनी हुई है। गर्दन की रक्त वाहिकाओं में चोट जैसे मामलों में हर मिनट कीमती होता है। यदि उसी समय आपरेशन थियेटर और संबंधित विशेषज्ञ उपलब्ध होते तो शायद छात्रा की जान बच सकती थी।

    इंट्रूबेशन से सांस की नली में डालते हैं पाइप

    मरीज जब स्वयं से सांस लेने में असमर्थ होता है। ऐसे में सांस की नली में पाइप डालकर सांस देने का काम किया जाता है। इस प्रक्रिया को इंट्रूबेशन कहा जाता है।

    जानें क्यों प्रयोग की जाती सेंट्रल लाइन

    कंधे की हड्डी में कालर बोन के पास रक्त शिरा में छेद कर दिया जाता है, जिसमें लाइन डाली है, जिसको सेंट्रल लाइन कहते हैं। इससे रक्त चढ़ाया जाता है, जिससे घायल व्यक्ति के शरीर में तेजी से रक्त चढ़ाया जाता है। यह आपात स्थिति में किया जाता है।

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