दुष्कर्म मामले में दोषी पूर्व कांस्टेबल 15 वर्ष बाद इलाहाबाद HC से बरी, अलीगढ़ अदालत की सुनाई गई सजा रद
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में पूर्व कांस्टेबल रतन सिंह को 15 साल बाद बरी कर दिया ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट की फाइल फोटो।
HighLights
अलीगढ़ के अपर सत्र न्यायाधीश ने 10 वर्ष कैद व 10 हजार जुर्माने की सुनाई थी सजा
नाबालिग पीड़िता के साथ बार-बार दुष्कर्म किया और शादी का झांसा देने का आरोप
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वर्ष 2011 में अलीगढ़ की अदालत द्वारा दुष्कर्म मामले में सुनाई गई सजा रद करते हुए पूर्व पुलिस कांस्टेबल रतन सिंह को बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की एकलपीठ ने यह निर्णय सुनाया।
अभियोजन पक्ष की दलील
अभियोजन पक्ष के अनुसार अपीलार्थी समय थाना चंदौस में तैनात था और पीड़िता के चचेरे भाई बृजेश कुमार के घर उसका आना-जाना था। आरोप था कि उसने पारिवारिक परिचय का लाभ उठाकर नाबालिग पीड़िता के साथ बार-बार दुष्कर्म किया और शादी का झांसा दिया।
अलीगढ़ के अपर सत्र न्यायाधीश ने दोषी करार दिया
बताया कि सितंबर 2005 में पीड़िता की चिकित्सा जांच में यह पता चला कि वह लगभग तीन माह की गर्भवती है, जिसके बाद एफआईआर दर्ज कराई गई। अलीगढ़ के अपर सत्र न्यायाधीश ने 28 मार्च 2011 को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत दोषी करार देते हुए उसे 10 वर्ष के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
बचाव पक्ष का तर्क
बचाव पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि घटना के लगभग 18 दिन बाद एफआईआर दर्ज कराई गई, जिसका संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं था। पिस्तौल दिखाकर धमकाने या मुंह दबाने जैसे आरोप बाद में जोड़े गए। चिकित्सकीय जांच में पीड़िता के शरीर पर कोई चोट या संघर्ष का निशान नहीं मिला। पीड़िता के पिता, दादी और अन्य पारिवारिक गवाहों का बयान जांच अधिकारी ने नहीं दर्ज किया।
शासकीय अधिवक्ता ने इन दलीलों का विरोध किया
कहा गया कि स्कूल रजिस्टर के अनुसार पीड़िता की जन्मतिथि एक मई 1983 थी, यानी घटना के समय उसकी उम्र लगभग 22 वर्ष थी, नाबालिग होने का दावा साबित नहीं हुआ। राज्य सरकार के लिए अपर शासकीय अधिवक्ता ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता का बयान और गर्भावस्था की पुष्टि अभियोजन पक्ष के आरोपों का समर्थन करती है।
संबंधित अदालत में जमानत बांड जमा करने का निर्देश
अदालत ने कहा कि केवल पीड़िता के बयान के आधार पर सजा दी जा सकती है, बशर्ते वह पूरी तरह विश्वसनीय हो, लेकिन मौजूदा मामले में परिस्थितियों को समग्र रूप से देखने पर संदेह उत्पन्न होता है। जब घटना की वास्तविक प्रकृति संदिग्ध हो तो संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए। अपील स्वीकार करते हुए कोर्ट ने अभियुक्त को दो माह के भीतर संबंधित अदालत में जमानत बांड जमा करने का निर्देश भी दिया।
