1987 से वेतन नहीं मिलने के मामले में मदरसा शिक्षकों को इलाहाबाद HC से राहत नहीं, कोर्ट ने खारिज की याचिका
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आजमगढ़ के मदरसा शिक्षकों की 1987 से वेतन की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। ...और पढ़ें

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की फाइल फोटो।
HighLights
आजमगढ़ के एक मदरसा से जुड़े मामले में हाई कोर्ट का फैसला
कोर्ट ने कहा- कुछ समय वेतन मिलने मात्र से ही नियुक्ति वैध नहीं
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आजमगढ़ स्थित एक मदरसा शिक्षकों व स्टाफ की वर्ष 1987 से वेतन की मांग में दाखिल याचिका खारिज कर दी है। यह आदेश न्यायमू्र्ति मंजूरानी चौहान की एकलपीठ ने दिया है। कोर्ट ने कहा है कि केवल मासिक विवरणी में नाम दर्ज होना या कुछ समय वेतन मिलना नियुक्ति की वैधता सिद्ध नहीं करता। याचिका वर्ष 2003 में दायर की गई थी।
आजमगढ़ स्थित मदरसा जमीयतुल कुरैश जलालंधरी में परवेज आलम, आफताब हुसैन, अरशद हुसैन (सहायक अध्यापक), मोहम्मद जावेद (क्लर्क) और मोहम्मद मुस्तफा (चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी) ने 1981 से 1987 के बीच नियुक्ति पाने का दावा किया था। उनका कहना था कि मई 1987 तक उन्हें वेतन मिलता रहा, लेकिन प्रबंध समिति में विवाद के बाद उनका वेतन रोक दिया गया जबकि उनकी सेवा कभी औपचारिक रूप से समाप्त नहीं की गई।
याचीगण ने 26 अगस्त 2003 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें संयुक्त निदेशक अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने उनका वेतन दावा खारिज कर दिया था। सरकार की तरफ से तर्क दिया गया कि याचीगण की नियुक्ति निर्धारित भर्ती प्रक्रिया और विज्ञापन के बिना हुई थी। इसके अलावा 28 जुलाई 2018 की प्रधानाचार्य रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि याचीगण ने कभी संस्था में कार्य नहीं किया और उनके ज्वाइनिंग पत्रों पर प्रधानाचार्य के फर्जी हस्ताक्षर पाए गए।
काम नहीं तो वेतन नहीं’ के सिद्धांत के आधार पर तथा सरकारी आदेश 21 नवंबर 2001 के अनुसार भी उनका दावा खारिज योग्य बताया गया। याची यह साबित करने में असफल रहे कि उनकी नियुक्तियां कानूनी प्रक्रिया के तहत हुई थीं। अदालत ने माना कि 16 मार्च 2001 का सरकारी पत्र भी नियुक्तियों की वैधता का स्वतंत्र आधार नहीं बन सकता। इन आधारों पर कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
