'DNA टेस्ट की मांग सिर्फ विलंब के आधार पर खारिज नहीं की जा सकती', इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि दुष्कर्म मामले में डीएनए टेस्ट की मांग को केवल देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। ...और पढ़ें


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विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि दुष्कर्म केस में डीएनए टेस्ट की मांग को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता है कि इसे देरी से दायर किया गया है।
डीएनए टेस्ट के गंभीर सामाजिक परिणाम होते हैं, लेकिन जब इसके लिए मजबूर करने वाले और अपरिहार्य परिस्थितियां होती हैं, तो इसकी अनुमति दी जा सकती है। इन टिप्पणियों के साथ न्यायमूर्ति मनोज बजाज की एकल पीठ ने आरोपित के उस आवेदन को मंजूर किया है, जिसमें उसने पीड़िता (शिकायतकर्ता) के पत्र की हस्तलेखन की जांच कराने की मांग की थी।
कोर्ट ने कहा है कि यह एक महत्वपूर्ण सुबूत है जो मामले के फैसले में मदद कर सकता है। साथ ही शिकायतकर्ता की बेटी और आरोपित का डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया है। इसके अलावा कोर्ट ने शिकायतकर्ता की वह याचिका खारिज कर दी है जिसमें आरोपित के रिश्तेदारों को समन करने की मांग की गई थी।
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कोर्ट ने कहा, डीएनए टेस्ट का आदेश नियमित रूप से नहीं दिया जा सकता है, खासकर जब मामला पहले से ही ट्रायल में हो। पीड़िता (शिकायतकर्ता) ने तीन अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं। आरोप लगाया आरोपित ने उसके साथ दुष्कर्म किया और गर्भवती होने के बाद गर्भपात करवा दिया।
पीड़िता ने आरोपित के उस आवेदन को खारिज करने की मांग की थी, जिसमें उसने अपनी बेटी के साथ डीएनए टेस्ट कराने की मांग की थी। यह मामला गाजियाबाद के कवि नगर थाने में दर्ज है। पीड़िता ने इस मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश/एफटीसी- गाजियाबाद के आदेशों को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।