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'भूमिहीन बटाईदार किसान भी मुआवजे का पात्र', इलाहाबाद HC का महत्वपूर्ण आदेश; चित्रकूट की याची को राहत दी

By Suresh pandey Edited By: Brijesh Srivastava
Updated: Wed, 26 Aug 2026 05:38 PM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि भूमिहीन बटाईदार किसान भी मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना के तहत मुआवजे ...और पढ़ें

इलाहाबाद उच्च न्यायालय।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय।

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की

  2. डीएम का 26 दिसंबर 2025 का आदेश रद कर मामला पुनर्विचार के लिए वापस भेजा 

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि भूमिहीन बटाईदार किसान भी मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना के तहत मुआवजे का पात्र है। न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने यह टिप्पणी चित्रकूट निवासी मंजू की याचिका स्वीकार करते हुए की है।

तीन माह में नया आदेश पारित करने का निर्देश 

अदालत ने जिलाधिकारी का 26 दिसंबर 2025 का आदेश रद कर मामला पुनर्विचार के लिए वापस भेजते हुए निर्देश दिया है कि वे शासनादेश के आलोक में सभी साक्ष्यों पर विचार कर तीन महीने के भीतर नया आदेश पारित करें।

याची ने डीएम के आदेश को दी थी चुनौती

याची ने जिलाधिकारी (डीएम) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके पति फूलचंद्र की दुर्घटना में मृत्यु पर योजना के तहत आर्थिक सहायता का दावा खारिज कर दिया गया था। जिलाधिकारी ने यह दावा इस आधार पर निरस्त किया था कि मृतक के नाम कोई कृषि भूमि दर्ज नहीं थी, इसलिए वह किसान नहीं माना जा सकता।

याची के अधिवक्ता का तर्क 

याची के अधिवक्ता ने अदालत में तर्क दिया कि यह आधार 28 फरवरी 2020 के शासनादेश के विपरीत है, जिसमें बटाईदार के रूप में खेती करने वाले भूमिहीन व्यक्तियों को भी ‘किसान’ की परिभाषा में शामिल किया गया है। याचिका में भू-स्वामी सूरजपाल और दो अन्य ग्रामीणों के शपथपत्र प्रस्तुत किए गए थे, और कहा गया था कि फूलचंद्र गाटा संख्या 683 पर बटाई के आधार पर खेती करता था।

राज्य की ओर से क्या तर्क दिया गया?

राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि राजस्व अधिकारियों की जांच रिपोर्ट में यह साबित नहीं हुआ कि मृतक बटाईदार के रूप में खेती करता था अथवा यही उसकी आजीविका का मुख्य साधन था। इसलिए जिलाधिकारी का आदेश उचित है।

खंडपीठ का महत्वपूर्ण निर्णय 

खंडपीठ ने कहा, शासनादेश के अनुसार 'किसान' की परिभाषा में केवल भू-स्वामी ही नहीं, बल्कि पट्टे या बटाई पर खेती करने वाले भूमिहीन व्यक्ति भी हैं, यदि खेती ही उनकी आजीविका का मुख्य साधन हो। बटाईदार की स्थिति साबित करने के लिए भू-स्वामी या उसके उत्तराधिकारी का प्रमाणपत्र या ग्राम प्रधान और लेखपाल का संयुक्त प्रमाणपत्र पर्याप्त है। कोर्ट ने पाया कि भू-स्वामी के प्रमाणपत्र और अन्य साक्ष्यों पर जिलाधिकारी द्वारा विचार नहीं किया गया और आदेश केवल भूमि अभिलेख में नाम न होने के आधार पर पारित किया गया जो योजना की मंशा के विपरीत है।

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