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    बहू अपने सास-ससुर को भरण-पोषण भत्ता देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं, इलाहाबाद HC का महत्वपूर्ण फैसला

    By Suresh pandey Edited By: Brijesh Srivastava
    Updated: Sun, 29 Mar 2026 06:42 PM (IST)

    इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि बहू कानूनी तौर पर अपने सास-ससुर को भरण-पोषण भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं है। एकलपीठ ने सास-ससुर की याचिका खारिज करते हुए ...और पढ़ें

    इलाहाबाद उच्च न्यायालय की फाइल फोटो।

    इलाहाबाद उच्च न्यायालय की फाइल फोटो। 

    HighLights

    1. बेटे की मृत्यु के उपरांत कांस्टेबल बहू से गुजारा भत्ता की मांग में दायर याचिका खारिज

    2. आपराधिक पुनरीक्षण याचिका में आगरा की फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी

    विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। नैतिक दायित्व की अवधारणा भले ही कितनी मजबूत हो, वह किसी वैधानिक आदेश के अभाव में कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं की जा सकती। यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकलपीठ ने बहू से भरण-पोषण की मांग में दायर ससुर व सास की वह आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी है, जिसमें आगरा की फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। 

    कोर्ट ने कहा है कि बहू अपने सास ससुर को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण भत्ता देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। कोर्ट का कहना था कि विधायिका ने अपने विवेक से उक्त प्रावधान के दायरे में सास-ससुर को शामिल नहीं किया है। दूसरे शब्दों में, विधायिका की यह मंशा नहीं है कि उक्त प्रावधान के तहत बहू पर अपने सास-ससुर के प्रति भरण-पोषण का दायित्व डाला जाए।

    मुकदमे से जुड़े संक्षिप्त तथ्य यह हैं कि याची राकेश कुमार ने अपने पुत्र प्रवेश कुमार का विवाह 26 अप्रैल 2016 को प्रतिवादी से किया था । प्रतिवादी उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल है। प्रवेश कुमार की 31 मार्च 2021 को मृत्यु हो गई थी। तत्पश्चात उसके पक्ष में देय सारे लाभों का भुगतान पत्नी को हुआ था। कोर्ट ने कहा, पक्षों की दलीलों पर विचार करने और रिकार्ड की जांच करने पर, यह स्वीकृत स्थिति है कि याचीगण ,प्रतिवादी संख्या 2 के ससुर और सास हैं।

    दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत संबंधित प्रावधानों) के अंतर्गत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार वैधानिक अधिकार है और यह केवल उन व्यक्तियों की श्रेणियों तक ही सीमित है जिनका उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है। प्रश्नगत मामले में रिकार्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह इंगित करता हो कि बहू को मिली नौकरी अनुकंपा के आधार पर थी।

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    मृतक की संपत्ति के उत्तराधिकार के संबंध में दी गई दलील भी धारा 125 संबंधित प्रावधानों के तहत कार्यवाही में विचारणीय नहीं है, क्योंकि ऐसे मुद्दे संक्षिप्त भरण-पोषण कार्यवाही के दायरे से बाहर हैं। इस कानूनी स्थिति के आलोक में आगरा के प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय के 21 अगस्त 2025 को पारित आदेश में कोई अवैधता, विकृति या त्रुटि नहीं है ।

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