Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    कैंसर व खतरनाक बैक्टीरिया से लड़ेगा चिरौंजी का 'ग्रीन नैनो हथियार', गठिया-अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारियों में भी उपयोगी

    By Digital Desk Edited By: Brijesh Srivastava
    Updated: Sun, 28 Jun 2026 01:16 PM (IST)

    इलाहाबाद व दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने चिरौंजी से 'ग्रीन नैनो हथियार' विकसित किया है, जो कैंसर, खतरनाक बैक्टीरिया और फंगस से लड़ेगा। यह गठिय ...और पढ़ें

    चिरौंजी के पौधे से बनाया गया 'ग्रीन नैनो टेक्नोलॉजी'' खतरनाक बैक्टीरिया से लड़ेगा।

    चिरौंजी के पौधे से बनाया गया 'ग्रीन नैनो टेक्नोलॉजी'' खतरनाक बैक्टीरिया से लड़ेगा।

    HighLights

    1. कैंसर, समय से पहले बुढ़ापा, गठिया और अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारियों में उपयोगी

    2. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध सीएमपी के शोधकर्ताओं ने बनाई है ग्रीन नैनो टेक्नोलॉजी

    जागरण संवाददाता, प्रयागराज। जिस चिरौंजी को लोग स्वाद और सेहत के लिए जानते हैं, वही अब आधुनिक विज्ञान में नई उम्मीद बनकर उभरी है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सीएमपी डिग्री कॉलेज और दिल्ली विश्वविद्यालय के विज्ञानियों ने चिरौंजी के पौधे की मदद से ऐसी ग्रीन नैनोटेक्नोलाजी विकसित की है, जो भविष्य में कैंसर, बैक्टीरिया जनित संक्रमण और फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले फंगस से लड़ने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।

    अंतरराष्ट्रीय जर्नल में यह शोध प्रकाशित 

    इसमें किसी भी जहरीले रसायन का इस्तेमाल नहीं किया गया। वैज्ञानिकों ने चिरौंजी के पौधे से प्राप्त एक लाभकारी कवक की मदद से सूक्ष्म जिंक आक्साइड नैनोपार्टिकल्स तैयार किए हैं। शोध स्प्रिंगर नेचर समूह के अंतरराष्ट्रीय जर्नल थ्री-बायोटेक के जून अंक में प्रकाशित हुआ है।

    टीम के इन सदस्यों ने किया शोध  

    शोध को प्रधान अन्वेषक डॉ. आलोक कुमार सिंह के निर्देश में शोधकर्ता स्नेहा द्विवेदी, अंकिता राय, अजीत कुमार मद्धेशिया, अनुराग मिश्रा, डॉ. ठाकुर प्रसाद यादव की टीम ने पूरा किया। डॉ. आलोक सिंह के अनुसार आमतौर पर जिंक आक्साइड नैनोपार्टिकल्स के निर्माण में महंगे और विषैले रसायनों का उपयोग किया जाता है, जिनसे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों को खतरा रहता है।

    प्रक्रिया को हरित, सुरक्षित और कम खर्चीला बनाया 

    हालांकि शोधकर्ताओं ने 'साल-जेल' तकनीक के साथ कवक के प्राकृतिक अर्क का उपयोग कर पूरी प्रक्रिया को हरित, सुरक्षित और कम खर्चीला बना दिया। इस विधि से उच्च गुणवत्ता के नैनोपार्टिकल्स तैयार हुए, जो पर्यावरण के लिए भी पूरी तरह अनुकूल हैं। तैयार किए गए नैनोपार्टिकल्स का आकार केवल 17 नैनोमीटर पाया गया। इतनी सूक्ष्म संरचना इन्हें मानव शरीर और जैविक प्रणालियों में अधिक प्रभावी बनाती है।

    खबरें और भी

    खतरनाक बैक्टीरिया के खिलाफ शानदार असर 

    परीक्षणों में इन नैनोपार्टिकल्स ने शरीर में बनने वाले हानिकारक फ्री-रेडिकल्स को निष्क्रिय करने की क्षमता दिखाई। यही फ्री-रेडिकल्स कैंसर, समय से पहले बुढ़ापा, गठिया और अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारियों से जुड़े माने जाते हैं। यहीं नहीं, इसने खतरनाक बैक्टीरिया ई-कोलाई और स्यूडोमोनास एरुगिनोसा के खिलाफ भी शानदार असर दिखाया।

    फसल को नुकसान पहुंचाने वाले फंगस पर भी कारगर 

    साथ ही फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले फंगस फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम की वृद्धि को लगभग 60 प्रतिशत तक रोकने में सफलता हासिल की। इससे भविष्य में पर्यावरण-अनुकूल जैविक फफूंदनाशक विकसित करने की संभावना बढ़ गई है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तकनीक का उपयोग आने वाले समय में एंटी-बैक्टीरियल दवाओं, क्रीम, चिकित्सा उपकरणों, जल शोधन प्रणाली और कृषि के लिए स्मार्ट कीटनाशकों के निर्माण में किया जा सकेगा। इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के भौतिकी एवं खगोल भौतिकी विभाग ने संयुक्त रूप से योगदान दिया।

    यह भी पढ़ें- Vindhya Expressway : धरातल पर लाने की प्रक्रिया तेज, प्रयागराज से सोनभद्र तक 330 किमी प्रस्तावित है विंध्य एक्सप्रेसवे

    यह भी पढ़ें- झटकों के बीच भी बनाए रखेगा संतुलन सेल्फ-बैलेंसिंग स्कूटर रोबोट, IIIT Allahabad के शोधार्थियों ने विकसित की है तकनीक