Teejan Bai Memories : तंबूरे को बना लेतीं बंसी तो कभी गदा...ऐसी थीं तीजनबाई, दर्शकों को मंच से जाेड़ने की कला जानती थीं
Teejan Bai Memories पद्मश्री और पद्मविभूषण तीजनबाई दर्शकों को मंच से जोड़ने की कला में माहिर थीं। प्रयागराज से उनका गहरा लगाव था, जहां उन्होंने माघ और ...और पढ़ें

Teejan Bai Memories पद्मविभूषण तीजनबाई से एक कार्यक्रम के दौरान भेंट करतीं डॉ मधु शुक्ला (फाइल फोटो)। सौजन्य- स्वतः
HighLights
पंडवानी लोकगायिका पद्मश्री व पद्मविभूषण तीजनबाई की सुनहरी यादें
अपनी कला के अलावा तीजनबाई का इलाहाबाद से गहरा लगाव था
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। Teejan Bai Memories पंडवानी लोकगायिका पद्मश्री और पद्मविभूषण तीजनबाई अच्छी तरह से जानती थीं कि दर्शकों को मंच से जाेड़ना कैसे है। तंबूरे को कभी बंसी बना लेती थीं, कभी गदा और कभी धनुष। प्रसंग के अनुसार भाव भंगिमा में उनका चेहरा बदल जाता था। प्रस्तुति के दौरान तीजनबाई का चेहरा कभी भीम जैसा दिखता था तो कभी कृष्ण की तरह। जिन्होंने मंच पर तीजनबाई की ऊर्जा देखी है, उनकी स्मृतियों में आज भी चित्रण तरोताजा है। जब-जब प्रयागराज आईं, उन्होंने लोक गायन की अमिट छाप छोड़ी।
माघमेला, कुंभमेला में वर्षाें दी प्रस्तुति
तीजनबाई अपनी कला के अलावा प्रयागराज (पूर्ववर्ती इलाहाबाद) से गहरा लगाव रखती थीं। एनसीजेडसीसी (उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र) और स्पिक मैके संस्था के आमंत्रण पर लगभग 20 आयोजनों में आ चुकी हैं। माघ और कुंभ मेलों में एनसीजेडसीसी की ओर से परेड पर आयोजित 'चलो मन गंगा यमुना तीर' कार्यक्रम में कई साल उनकी प्रस्तुति हुई।
'किरदार को मंचन पर जीना जानती थीं'
Teejan Bai Memories स्पिक मैके संस्था की राज्य समन्वयक डॉ. मधु शुक्ला कहती हैं कि तीजनबाई उनसे आत्मीय लगाव रखती थीं। 15 से अधिक बार कार्यक्रमों में बुलावे पर आ चुकी हैं। बताया कि द्रोपदी चीर हरण का प्रसंग हो, कृष्ण से दुर्योधन या धृतराष्ट्र के बीच हुए संवाद हों। किसी भी प्रसंग पर उनकी प्रस्तुति बेहद प्रभावी रहती थी। कहती हैं कि किरदार को मंचन पर जीना जानती थीं तीजनबाई।
'विश्वास नहीं हो रहा है कि तीजनबाई अब नहीं रहीं'
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मीडिया स्टडीज सेंटर के समन्वयक डॉ. धनंजय चोपड़ा, 2001 में तीजनबाई के साक्षात्कार को याद करते हैं। बताया कि पांडवों की गाथा को मंच पर गाती थीं, जनसरोकार को महाभारत से जोड़ना उन्हें बखूबी आता था। कहा कि विश्वास नहीं हो रहा है कि तीजनबाई अब नहीं रहीं। उन पर मोनोग्राफ लिखने का सौभाग्य मिला था। 2002 में यह एनसीजेडसीसी की ओर से प्रकाशित हुआ था। यह मोनोग्राफ तीजनबाई पर लिखी गई पहली किताब थी। बताया कि उनसे कई बार मंच साझा किया है।
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'चली गईं तीजनबाई'
कवि यश मालवीय ने तीजनबाई को कुछ इस तरह से काव्यात्मक श्रद्धांजलि दी। 'चली गई तीजनबाई, मंचों पर अब नहीं सजेगी वो मशाल सी तरुणाई टूट गए घुंघरू, चुपके से चली गई तीजनबाई। वो मिट्टी की गन्ध, हमारी संस्कृति का उजला चेहरा, ज्वार उठाता याद आएगा स्वर समुद्र गहरा गहरा। दुनिया भर में छत्तिसगढ़ की बदली रही घिरी छाई। वो संवाद, शब्द में, बंधती सी जीवन की लयकारी एक आग थी, सोए मन में बो देती थी चिनगारी व्यथा कथा लड़ती औरत की उसने जी भरकर गाई'।