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    खेत में खुदाई के दौरान मिला 2000 साल पुराना खजाना, रायबरेली में ASI की टीम ने खोज निकाले कुषाण काल के अवशेष

    Updated: Thu, 30 Jul 2026 06:50 AM (GMT+05:30)

    रायबरेली के ओइ गांव में खेत में मिली संरचना को पुरातत्व विभाग ने कुषाण काल के अवशेष बताया है, जो लगभग दो हजार साल पुराने हैं। ...और पढ़ें

    ओई गांव में गड्ढे के अंदर जांच करते पुरातत्व विभाग के अधिकारी और ग्रामीण के घर रखी आकृतियाें की फोटो लेते पुरातत्व विभाग के अधिकारी

    ओई गांव में गड्ढे के अंदर जांच करते पुरातत्व विभाग के अधिकारी और ग्रामीण के घर रखी आकृतियाें की फोटो लेते पुरातत्व विभाग के अधिकारी

    HighLights

    1. खेत में मिली संरचना कुषाण काल के अवशेष निकली।

    2. पुरातत्व विभाग की टीम ने मौके पर जांच की।

    3. करीब दो हजार वर्ष पुराने हैं ये ऐतिहासिक प्रमाण।

    संवाद सूत्र, रायबरेली। खेत में बनी सुरंग की जब खोज शुरू हुई तो कई रहस्य मिट्टी में दफन मिले। राज्य पुरातत्व विभाग की टीम बुधवार को मौके पर पहुंची, उस गहरे खड्ड में उतरकर जांच की तो तथाकथित सुरंग की हकीकत सामने आई।

    अधिकारियों को कुषाण काल के अवशेष के प्रमाण मिले हैं। ईंटों की संरचना और अन्य आकृतियां जो ग्रामीणों ने पूर्व से एकत्र की थी, वह भी करीब दो हजार वर्ष पुरानी प्रतीत हुई हैं। यह देख टीम भी हतप्रभ रही। वहां पर नाप जोख करते अधिकारी दो घंटे तक डटे रहे।

    अब इसकी रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी। पुरातत्व विभाग की टीम यहां की संस्कृति सभ्यता कैसी रही, और कितनी संस्कृतियां छिपी हैं, इस पर शोध के लिए खोदाई कर सकती है, लेकिन यह शासन के आदेश पर ही संभव होगा।

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    ओइ गांव में शुक्रवार को गुरुदेई के खेत मे एक मीटर परिधि का गड्ढा दिखा लोगों ने जब अंदर झांक कर देखा तो ईंट की दीवार एवं सुरंग जैसा गड्ढा दिखाई पड़ा। आकार काफी बड़ा होने के नाते लोगों को लगा कि यह सुरंग है। उसके बाद से जिले में सुंरग की चर्चाएं होने लगीं। लोग भी उत्सुकता वश वहां पहुंचने लगे।

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    मंगलवार को केंद्रीय पुरातत्व विभाग की टीम के आने पर साबित हो गया था कि यहां मिले अवशेष और गड्ढे में दिख रही दीवार प्राचीन सभ्यता से जुड़ी है। बुधवार को प्रदेश पुरातत्व विभाग के सहायक पुरातत्व अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव, अटेंडेंट हिमांशु सिंह पहुंचे।

    अधिकारी सीढ़ी के जरिए गड्ढे में उतरे और उपकरणों के जरिए लंबाई देखी। वहां दीवार दिखाई दी, ईंट की नाप की, जांच में यह सामने आया कि दीवार उत्तर दक्षिण बनी है। इसके बाद यह साबित हो गया कि यह सुरंग नहीं है, बल्कि कुषाण कालीन निर्माण है।

    उसी के अवशेष हैं। टीम को जानकारी हुई कि एक ग्रामीण के पास कई आकृतियां सहेजकर रखी गई हैं, तो वह ग्रामीण अशोक प्रताप मौर्य के पास पहुंचे और सहेजकर रखी गई धातुओं पर उकेरे चित्र, पत्थर, सुराही नुमा आकृतियाें को देखा, उनकी फोटो ली।

    पूर्व में भी पुरातत्व विभाग को भेजे गए थे पत्र

    यहां मिट्टी के नीचे कुछ था जरूर, इसका आभास ग्रामीणों को पहले से था। बुजुर्ग बताते थे कि यहां करीब 80 बीघे में टीला था, लोग वहां जाने से डरते थे। धीरे-धीरे वहां खेती होने लगी। बारिश के समय जब भी मिट्टी में दबी आकृतियां उभरती तो ग्रामीणों के हाथ लगतीं।

    अशोक प्रताप मौर्य के पास तमाम अवशेष एकत्र करके रखे गए हैं। अशोक ने बताया कि वह 40 वर्षों से जो भी वस्तु टीले पर नजर आ जाती थी, उसे वह लाकर रख लेते थे। इतना ही नहीं उन्होंने पूर्व में पुरातत्व विभाग को पत्र भेजा था और वर्ष 1996 में ग्राम स्तरीय सर्वे पुरातत्व विभाग ने किया था, लेकिन सब कुछ यथावत रह गया, जबकि विभिन्न स्तर पर कई पत्र लिखे गए।

    वर्ष 1985 में राज्य पुरातत्व विभाग से राजाराम शास्त्री आए थे और सर्वेक्षण किया। तब भी यह कुषाण काल की बात सामने आई थी। इस बारे में कई पत्र लिखे गए, लेकिन फिर किसी ने ध्यान नहीं दिया। अब खेत में गड्ढा बना तो अफसर भी जांच करने पहुंच गए।

    यहां की संस्कृति सभ्यता कैसी रही, जानेंगे अफसर

    राज्य पुरातत्व विभाग के सहायक पुरातत्व अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव का कहना है कि 15 फीट की लंबाई में गड्ढा बना है, ईंटों की संरचना मिली है, दीवार प्रतीत हो रही है, जो जमीन के अंदर उत्तर से दक्षिण की ओर है, ईंटों की नाप ऐसी है जो कुषाण कालीन संरचना होने का दावा करती है।

    जो और भी अवशेष देखने को मिले, ये सभी संरचनाएं कुषाण काल के समय बनती थी उससे मिलती जुलती हैं। यह करीब दो हजार वर्ष पुराना है। इसकी रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी, वहां से निर्देश मिलने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

    ऐसे जो क्षेत्र होते हैं उनके उद्देश्य होते हैं, उस उद्देश्य को लेकर यदि संभावनाएं बनती है तो शोध के लिए और यहां की संस्कृति सभ्यता कैसी रही है, यह जानने के लिए खोदाई की जा सकती है। इसके नीचे और भी कितनी संस्कृतियां हैं उसको भी जाना जा सकता है।

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