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    गोबर से बदला गांव का ढर्रा: रामपुर की किरा गोशाला ने बायोगैस से बनाई बिजली, 24 लोगों को मिला रोजगार

    Updated: Thu, 06 Aug 2026 02:44 PM (IST)

    रामपुर की किरा गोशाला में स्थापित बायोगैस प्लांट ने गांव का कायापलट कर दिया है, जिससे 24 लोगों को रोजगार मिला है और ढाई लाख की बिजली की बचत हुई है। यह ...और पढ़ें

    किरा गांव स्थित गोशाल में स्थापित बायोगैस प्लांट। जागरण

    किरा गांव स्थित गोशाल में स्थापित बायोगैस प्लांट। जागरण

    HighLights

    1. उपजाऊ फसल के लिए तैयार हो रही जैविक खाद, गोशाला की भी बढ़ी आय

    जागरण संवाददाता, रामपुर। नवाचार के जरिये शाहबाद विकास खंड की ग्राम पंचायत किरा सुर्खियों में है। तीन वर्ष पूर्व यहां की गोशाला में 40 लाख की लागत से 85 घन मीटर क्षमता का बायोगैस प्लांट स्थापित किया गया था। अब इस प्लांट से न सिर्फ खाद, बीज और उजियारा मिल रहा है बल्कि, ये बेरोजगारों का सहारा भी बन गया है। ये प्लांट अब तक ढाई लाख की बिजली बचा चुका है।

    किरा गांव में संचालित गोशाला में 816 गोवंशीय पशु संरक्षित हैं। यहां स्थापित बायोगैस प्लांट के संचालन के लिए प्रतिदिन 2125 किलोग्राम गोबर की आवश्यकता होती है। इसके जरिये प्रतिदिन 51 किलो गैस का उत्पादन होता है जिससे जनरेटर भी चलता है। इसके अलावा इसका उपयोग गोशाला की चारा मशीन, सार्वजनिक स्थलों की प्रकाश व्यवस्था और सबमर्सिबल पंपों को निर्बाध ऊर्जा देने में किया जाता है।

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    गौशाला के 24 केयरटेकर भी इसी बायोगैस का प्रयोग रसोई गैस के लिए कर रहे हैं। हर महीने प्लांट से पांच से छह ट्राली जैविक खाद निकल रही है। इसे किसानों को दो हजार रुपये प्रति ट्राली की दर पर बेचा जा रहा है। अब तक खाद बिक्री से मिले 53,800 रुपये गोशाला के खाते में जमा हो चुके हैं।

    ग्राम प्रधान नीतू के प्रयास से ही बायोगैस प्लांट स्थापित हुआ था। उन्होंने गांव में एक कोल्ड प्रेस आयल स्पेलर मशीन भी लगा दी है। यह मशीन भी इस प्लांट से संचालित होती है। इसके जरिए ग्रामीण मात्र तीन रुपये प्रति लीटर के खर्च पर अपनी सरसों से शुद्ध तेल निकलवा रहे हैं। जबकि, बाहर के स्पेलर पर पांच से छह रुपये प्रति लीटर के खर्च पर सरसों से तेल निकाला जाता है।

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    जल्द गोबर से बनेंगे गमले

    उप मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. शशांक नाथ बताते हैं कि सबसे बड़ी राहत गोशाला के उन 24 केयरटेकरों को मिली है, जिनके लिए यही बायोगैस अब रसोई गैस का काम कर रही है। केयरटेकर दिवाकर जैसे कर्मचारियों को अब चूल्हे के खतरनाक धुएं से मुक्ति मिल गई है, जिससे उनका स्वास्थ्य और जीवन स्तर काफी बेहतर हुआ है।

    प्रोजेक्ट ने गांव में करीब 24 लोगों को सीधा रोजगार दिया है, जो गोबर एकत्र करने, मशीन संचालन, स्लरी प्रबंधन और तेल उत्पादन में लगे हैं। बताया कि जल्द ही गौशाला में गोबर से गमले बनाने की मशीन भी लगाई जाएगी। इससे गोबर का और अधिक व्यावसायिक इस्तेमाल हो सकेगा।

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