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    हिंदू हो या मुस्लिम सबकी अंतिम यात्रा में शामिल होता है यह आवारा कुत्ता, सहारनपुर में बना कौतूहल का केंद्र

    By Manish Sharma Edited By: Praveen Vashishtha
    Updated: Sat, 04 Jul 2026 02:46 PM (IST)

    Saharanpur News : एक आवारा कुत्ता पिछले छह साल से सहारनपुर के खेड़ा अफगान कस्बे में होने वाली हर मौत के बाद अंतिम संस्कार में शामिल होता है। यह कुत्ता ...और पढ़ें

    कब्रिस्तान में ग्रामीणों के साथ बैठा कुत्ता। जागरण

    कब्रिस्तान में ग्रामीणों के साथ बैठा कुत्ता। जागरण

    HighLights

    1. जिस घर में भी मौत होती है, उसके दरवाजे पर जाकर बैठ जाता है

    2. एक-दो साल से नहीं, छह साल से कुत्ता लगातार कर रहा है ऐसा

    संवाद सूत्र, खेड़ा अफगान (सहारनपुर)। पिछले करीब छह साल से एक आवारा कुत्ता पूरे कस्बे के लिए कौतूहलका केंद्र बना हुआ है। इस बेजुबान की खासियत यह है कि कस्बे में जब भी और जिसके घर भी किसी की मौत होती है, दिन हो या रात सीधे उसके घर के दरवाजे पर पहुंच जाता है।

    गुरुवार की रात्रि लगभग 11 बजे गांव निवासी 70 वर्षीय जुल्फिकार अंसारी का बीमारी के बाद निधन हो गया। लोगों के पहुंचने से पहले ही यह कुत्ता वहां रात में ही पहुंच गया और शुक्रवार दोपहर तक जनाजे में शामिल होकर कब्रिस्तान में लोगों के साथ-साथ गया।

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     जनाजे के साथ-साथ चलता कुत्ता। जागरण

    ग्राम प्रधान ओमपाल ने बताया कि कुत्ता हिंदू परिवार में किसी की अर्थी उठने वाली हो या मुस्लिम परिवार में किसी का जनाजा निकलने वाला, यह हर अंतिम यात्रा में आदमियों के बीच शांति से चलता है। श्मशान घाट या कब्रिस्तान तक, यह अंतिम सफर में तब तक साथ रहता है, जब तक कि अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती।

    लगभग पंद्रह हजार के करीब की आबादी वाले इतने बड़े गांव में किस घर में अनहोनी होने पर इस बेजुबान को न जाने कैसे आहट मिल जाती है। जिस घर में भी मौत होती है, यह उसी वक्त उस घर के दरवाजे पर जाकर बैठ जाता है।

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    शुरुआत में लोगों ने इसे माना था महज संयोग 

    शुरुआत में लोगों ने इसे महज एक संयोग माना था, लेकिन जब हर मौत के वक्त इस कुत्ते की मौजूदगी देखी गई तो लोग दंग रह गए। यह कुत्ता कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता और गमगीन माहौल में चुपचाप बैठा रहता है।

    अब आलम यह है कि गांव वाले भी इसे कोई साधारण जीव नहीं मानते। लोग इसे सम्मान की नजर से देखते हैं और इसके खाने-पीने का खास ख्याल रखते हैं। उनका कहना है कि यह बेजुबान सौहार्द का एक ऐसा पाठ पढ़ा रहा है जिसे इंसान भी शायद भूलता जा रहा है।

    इन्होंने कहा 

    यदि कोई कुत्ता अर्थी के पीछे श्मशान या कब्रिस्तान तक जाता है, तो उसे उसके लगाव, सामाजिक स्वभाव, जिज्ञासा और गंध का अनुसरण करने वाले व्यवहार के रूप में समझना अधिक उचित है, न कि यह मान लेना कि वह अंतिम संस्कार के धार्मिक महत्व को समझ रहा है।
    -डा. एमपी सिंह गौर, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी, सहारनपुर।

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