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संभल हिंसा आयोग रिपोर्ट: जिस भाषण से साध रहे थे सियासत, वही सांसद जियाउर्रहमान बर्क के लिए बना आफत

Published: Sat, 08 Aug 2026 04:39 AM (IST)

न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट में संभल हिंसा से पहले सांसद जियाउर्रहमान बर्क के भाषणों को माहौल बनाने वाली अहम ...और पढ़ें

सांसद जियाउर्रहमान बर्क और संभल में हिंसा के दौरान फूंकी गई कार  जागरण आर्काइव

सांसद जियाउर्रहमान बर्क और संभल में हिंसा के दौरान फूंकी गई कार जागरण आर्काइव

HighLights

  1. आयोग की रिपोर्ट में भाषणों को हिंसा से पहले माहौल बनाने वाली अहम कड़ी मानने के बाद राजनीति पर मंडराए संकट के बादल

शिवकुमार कुशवाहा, बहजोई (संभल)। संभल हिंसा की न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट ने केवल 24 नवंबर 2024 की घटना की परतें ही नहीं खोलीं, बल्कि उससे पहले की राजनीतिक बयानबाजी को भी कठघरे में खड़ा कर दिया। जिन भाषणों के जरिए सांसद जियाउर्रहमान बर्क समर्थकों के बीच राजनीतिक संदेश देने का प्रयास कर रहे थे, आयोग ने उन्हें हिंसा से पहले माहौल बनाने की अहम कड़ी माना है।

अब इन्हीं बयानों के राजनीतिक असर और संभल की विरासत वाली सियासत पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर समीकरण बदल सकते हैं क्योंकि इसी घटना के एक प्रमुख आरोपित सदर जफर अली पहले ही विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके हैं, जिससे मौजूदा विधायक और सांसद की सिसायत पर सीधा असर पड़ना तय है।

दरअसल, रिपोर्ट में सांसद जियाउर्रहमान बर्क के 19, 22 और 23 नवंबर 2024 के भाषणों को हिंसा से पहले बने माहौल की महत्वपूर्ण कड़ी बताए जाने के बाद इसका असर अब केवल कानूनी दायरे तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके राजनीतिक निहितार्थ भी सामने आने लगे हैं।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बर्क के उन बयानों का विस्तार से उल्लेख किया है, जिनमें उन्होंने कहा था कि जैसे अयोध्या में हमारी मस्जिद छीन ली गई, अब इसे छिनने नहीं देंगे, मस्जिद थी, मस्जिद है और कयामत तक मस्जिद रहेगी। जामा मस्जिद की हिफाजत के लिए हर तरह की लड़ाई लड़ी जाएगी।

आयोग ने निष्कर्ष दिया कि इन बयानों से मस्जिद के तत्काल खतरे में होने का संदेश गया और एक विशेष समुदाय को एकजुट करने का प्रयास हुआ। राजनीतिक हलकों में अब चर्चा इस बात की है कि जिन बयानों के जरिए बर्क अपने समर्थकों को राजनीतिक संदेश देना चाहते थे, वही बयान अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं।

कुंदरकी विधानसभा उपचुनाव में सपा की हार के बाद जिस तरह राजनीतिक दबाव बढ़ा, उसके बीच आए ये बयान अब आयोग की रिपोर्ट का हिस्सा बन चुके हैं। यदि आगे की कानूनी प्रक्रिया में भी इन निष्कर्षों का प्रभाव बना रहता है तो संभल की विरासत आधारित सियासत नए दौर में प्रवेश कर सकती है।

जामा मस्जिद इंतजामिया समिति के सदर जफर अली भी इस प्रकरण में आरोपित हैं और भविष्य में चुनाव लड़ने की चर्चाएं पहले से होती रही हैं। ऐसे में मुस्लिम नेतृत्व के भीतर नई दावेदारियां उभरने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। संभल की राजनीति लंबे समय से प्रभावशाली मुस्लिम परिवारों और सामाजिक समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है।

ऐसे में यदि आयोग की रिपोर्ट राजनीतिक बहस का केंद्र बनी रहती है तो तुर्क, पठान और अन्य प्रभावशाली वर्गों के बीच नेतृत्व को लेकर नई प्रतिस्पर्धा देखने को मिल सकती है।

हालांकि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में किसी राजनीतिक परिणाम पर टिप्पणी नहीं की है, लेकिन बर्क के भाषणों को जिस विस्तार और गंभीरता से दर्ज किया गया है, उसने इतना संकेत जरूर दे दिया है कि संभल की विरासत वाली सियासत अब पहले जैसी सहज नहीं रह सकती और आने वाले समय में नए राजनीतिक चेहरे तथा नए समीकरण उभरने की संभावना बढ़ सकती है।

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