सावन माह की कांवड़ यात्रा में रखें यह ध्यान, काशी के ज्योतिषाचार्य ने बताया शिव की कृपा प्राप्त करने का नियम और संयम
कांवड़ यात्रा के नियम केवल उत्साह नहीं, बल्कि अनुशासन पर आधारित हैं, जिसमें सत्य, ब्रह्मचर्य और शुद्धता का पालन महत्वपूर्ण है। काशी के ज्योतिषाचार्य ड ...और पढ़ें

सावन कांवड़ यात्रा के नियम: शिव कृपा पाने के लिए इन बातों का रखें ध्यान।
HighLights
कांवड़ यात्रा में सत्य, ब्रह्मचर्य और शुद्धता का पालन करें।
कांवड़ को सीधे भूमि पर न रखने की परंपरा का सम्मान करें।
भगवा वस्त्र त्याग और साधना का प्रतीक, शिव कृपा दिलाता है।
जागरण संवाददाता वाराणसी। रानी पद्मावती तारा योगतन्त्र आदर्श सांस्कृतिक महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. कमलेश झा के अनुसार, कांवड़ यात्रा के नियम शास्त्रीय और पारंपरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं। कांवड़ यात्रा का आधार केवल उत्साह नहीं, बल्कि अनुशासन भी है। धर्मशास्त्रों में यात्रा और तीर्थयात्रा के जो सामान्य नियम बताए गए हैं, वे कांवड़ यात्रा पर भी लागू होते हैं।

इन नियमों का करें पालन
1. सत्य का पालन: असत्य, छल और कटु वचन से बचना चाहिए।
2. ब्रह्मचर्य: यात्रा के दौरान इंद्रिय निग्रह एवं मन की पवित्रता बनाए रखनी चाहिए।
3. सज्जनता का आचार: मांस, मदिरा, तंबाकू, नशा तथा तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग करना चाहिए।
4. शुद्धता: प्रतिदिन स्नान, स्वच्छ वस्त्र और पूजा का पालन करना चाहिए।
5. सेवा: मार्ग में असहाय, वृद्ध या अन्य कांवड़ियों की सहायता करना भी सेवा का एक रूप है।
6. क्रोध से बचें: स्वयं 'आशुतोष' हैं; उनके भक्तों में भी धैर्य और करुणा का होना आवश्यक है।
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कांवड़ को भूमि पर रखने का प्रश्न: कई स्थानों पर यह परंपरा है कि कांवड़ को सीधे भूमि पर नहीं रखा जाता, बल्कि इसे विशेष स्टैंड या लकड़ी के सहारे रखा जाता है। यह नियम मुख्यतः लोक परंपरा का अंग है। इसका उद्देश्य गंगाजल के प्रति श्रद्धा और पवित्रता बनाए रखना है। शास्त्रों में इसका प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता, किंतु श्रद्धा के कारण यह परंपरा स्थापित हो चुकी है।
कांवड़ यात्रा में वस्त्र धारण का महत्व: सामान्यतः प्रचलित रंग भगवा (केसरिया) है। भगवा रंग भारतीय संस्कृति में त्याग, तपस्या, वैराग्य, साधना और धार्मिकता का प्रतीक माना जाता है। कुछ क्षेत्रों में श्रद्धालु सफेद वस्त्र भी धारण करते हैं। शास्त्र किसी विशेष रंग को अनिवार्य नहीं बताते, किंतु स्वच्छ, मायादित और साज्जनता के वस्त्र धारण करना अपेक्षित है।
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यात्रा के माध्यम से पापों का प्रायश्चित : कांवड़ यात्रा का आयोजन हर वर्ष सावन के महीने में होता है, जब श्रद्धालु गंगाजल लेकर अपने-अपने स्थानों पर जाते हैं। यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता और भाईचारे का भी संदेश देती है। श्रद्धालु इस यात्रा के माध्यम से अपने पापों का प्रायश्चित करते हैं और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने की कामना करते हैं।
श्रद्धालुओं की संख्या में हर वर्ष वृद्धि : कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या में हर वर्ष वृद्धि होती जा रही है। यह यात्रा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी सशक्त बनाती है। यात्रा के दौरान श्रद्धालु विभिन्न स्थानों पर रुकते हैं, जहां वे स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का अनुभव करते हैं। डॉ. कमलेश झा के अनुसार, इस यात्रा के नियमों का पालन करना आवश्यक है ताकि श्रद्धालु सही तरीके से अपनी आस्था को व्यक्त कर सकें और यात्रा का वास्तविक उद्देश्य प्राप्त कर सकें।