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    लंदन के संग्रहालय में रखी भोजशाला की वाग्देवी प्रतिमा की काशी में है अनुकृति, मिलता-जुलता मंदिर का महामंडपम्

    Updated: Mon, 01 Jun 2026 04:47 AM (GMT+05:30)

    काशी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में धार की भोजशाला से लंदन संग्रहालय ले जाई गई मां वाग्देवी की प्रतिमा की हूबहू अनुकृति स्थापित है। कांची शं ...और पढ़ें

    लंदन के संग्रहालय में रखी भोजशाला की वाग्देवी प्रतिमा की काशी में है अनुकृति।

    लंदन के संग्रहालय में रखी भोजशाला की वाग्देवी प्रतिमा की काशी में है अनुकृति।

    HighLights

    1. काशी में भोजशाला की वाग्देवी प्रतिमा की अनुकृति।

    2. संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में स्थापित परमार शैली का मंदिर।

    3. कांची शंकराचार्य ने कराया था प्रतिमा व मंदिर का निर्माण।

    शैलेश अस्थाना, वाराणसी। ब्रिटिश काल में धार में राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला से ले जाकर लंदन के संग्रहालय में रखी गई मां वाग्देवी की प्रतिमा की एक अनुकृति काशी स्थित प्राच्य विद्या के केंद्र में देखी जा सकती है। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर स्थित अनूठे मंदिर में काले पत्थर से निर्मित मां वाग्देवी की प्रतिमा हूबहू (रंग को छोड़) भोजशाला की प्रतिमा के रूप-आकार व शिल्प विन्यास में ढली है।

    यह मंदिर भी धार की भोजशाला की तरह ही परमार शैली में बना है। इसका निर्माण कांची कामकोटि पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती ने कराया था।

    प्रतिमा निर्माण के लिए उन्होंने तमिलनाडु के शिल्पकारों को कई बार लंदन भेजा था ताकि वे वहां रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा के आकार, आकृति और भाव-भंगिमा को अच्छी तरह से अवलोकित कर उसी तरह की प्रतिमा का निर्माण कर सकें।

    विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य डॉ. श्रीधर ओझा बताते हैं कि विश्वविद्यालय में सरस्वती मंदिर निर्माण की संकल्पना तत्कालीन प्रति कुलाधिपति पूर्व काशी नरेश डा. विभूति नारायण सिंह व पूर्व कुलपति वेंकटाचलम ने की थी। इस बीच काशी आए कांची शंकराचार्य को जब इस संकल्पना से अवगत कराया गया तो उन्होंने मंदिर व प्रतिमा निर्माण का दायित्व स्वयं ले लिया।

    परमार शैली में बने इस मंदिर के अर्ध मंडपम् में देवी के अन्य दिव्य रूपों को सुंदर ढंग से दर्शाया गया है तो गर्भगृह में वाग्देवी का स्वरूप दिखाई देता है। 27 मई 1998 को मंदिर उद्घाटित हुआ। शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने मंदिर का नामकरण वाग्देवी मंदिर किया। मंदिर निर्माण में उस समय 60 लाख रुपये खर्च हुए थे।

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    मंदिर की एक और विशेषता यहां स्थापित द्वादश सरस्वती विग्रह हैं, जिन्हें उत्तर भारत में अद्वितीय माना जाता है। मंदिर के समक्ष महामंडपम् है, जिसे सरस्वती कंठाभरण कहा जाता है। 1903 में तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन प्रतिमा ले गया इंग्लैंड 11वीं शताब्दी में मालवा में परमार वंश के राजा भोज का शासन था। धार को उन्होंने राजधानी बनाया।

    ज्ञान-विज्ञान के प्रसार के लिए विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी। इसे सरस्वती सदन या भोजशाला कहा गया। इसके मध्य में मां वाग्देवी की अनुपम प्रतिमा स्थापित करवाई। वर्ष 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा और धार पर आक्रमण के दौरान ज्ञान के इस मंदिर, विशाल पुस्तकालय और प्राचीन भित्तिचित्रों को नुकसान पहुंचाया।

    15वीं शताब्दी में ऐतिहासिक अवशेषों को ढंकते हुए मंदिर परिसर में मस्जिद का निर्माण करा दिया गया। वर्ष 1875 में ब्रिटिश राजनीतिक प्रतिनिधि मेजर जनरल विलियम किंकेड ने भोजशाला परिसर की खोदाई करवाई थी। इसी दौरान परिसर में दबाई गई वाग्देवी प्रतिमा को बाहर निकाला गया।

    बाद में वर्ष 1903 में तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन इस प्रतिमा को अपने साथ इंग्लैंड ले गए, जहां इसे ब्रिटिश संग्रहालय में रखा गया। वर्ष 2017 में ब्रिटिश संग्रहालय ने प्रतिमा लौटाने पर सैद्धांतिक सहमति जताई थी, लेकिन शर्त रखी थी कि इसे उसी स्थान पर स्थापित किया जाए, जहां से इसे ले जाया गया था।

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