कारगिल दिवस: पिता की शहादत बनी प्रेरणा, इकलौता बेटा सेना में भर्ती होकर कर रहा देश सेवा
कारगिल युद्ध में शहीद हरि बहादुर घले के बलिदान से प्रेरित होकर उनके बेटे कृष्णा ने भारतीय सेना में शामिल होकर देश सेवा का दायित्व संभाला है। ...और पढ़ें

कारगिल बलिदानी हरी बहादुर घले और उनकी पत्नी। सौ. स्वजन

समय कम है?
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संतोष बिष्ट, अल्मोड़ा। कारगिल युद्ध में बलिदान हुए मूल रूप से नेपाल निवासी वीर सैनिक सेना मेडल हरी बहादुर घले का बलिदान आज भी उनके परिवार के लिए गर्व और प्रेरणा का स्रोत है।
पिता की शहादत के समय बेटा कृष्णा केवल छह साल का था, लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, मां सरस्वती घले से सुनी पिता के साहस और देशभक्ति की कहानियों ने उसके मन में भी मातृभूमि की सेवा का जज्बा जगा दिया। इसके बाद उन्होंने बचपन से ही देश सेवा करने का संकल्प ले लिया। कृष्णा वर्तमान में भारतीय सेना में शामिल होकर देश की रक्षा का दायित्व निभा रहे हैं।
निभा रहे देश की रक्षा का दायित्व
उत्तराखंड की धरती को वीर भूमि ऐसे ही नहीं कहते हैं, यहां के लोगों ने देश सेवा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी है। आज भी यहां का अधिकांश युवा सेना में भर्ती होकर सीमाओं पर देश की रक्षा कर रहा है। जबकि कारगिल में भी देश सेवा करते हुए जिले के तीन वीर सैनिकों ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देकर दुश्मनों को खदड़ने में अहम योगदान दिया था।
उनमें से एक हाल निवासी दुगालखोला और मूल रूप से नेपाल निवासी रहे नायक हरि बहादुर घले ने दुश्मनों से लोहा लेते हुए 6 जुलाई 1999 को देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। वर्तमान में दुगालखोला में निवासरत बलिदानी हरी बहादुर घले के परिवारजनों ने बताया कि वह हमेशा देश को सर्वोपरि मानते थे। उनकी शहादत के बाद परिवार ने कठिन परिस्थितियों का सामना किया, लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी।
आज कृष्णा मेघालय में तैनात होकर देश सेवा कर रहे हैं। कृष्णा का कहना है कि, उसके पिता ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर किए थे और वही प्रेरणा उसे हर दिन अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित रहने की ताकत देती है। उसके लिए सेना की वर्दी केवल नौकरी नहीं, बल्कि पिता के अधूरे सपनों और बलिदान का सम्मान है। वह 2014 में कुमाऊं रेजीमेंट में भर्ती हुए, तब से देश सेवा में जुटे हैं।
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तीन छोटे बच्चों की जिम्मेदारी फिर भी वीरांगना सरस्वती ने नहीं मानी हार
बलिदानी हरी बहादुर घले की पत्नी सरस्वती माया घले ने बताया कि जिस समय देश के लिए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया, उनके बच्चे काफी छोटे थे, उनका इकलौता पुत्र उस समय केवल छह साल का था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी विपरीत परिस्थितियों में बच्चों की सही देखभाल कर उनके मन में देश सेवा का जज्बा भरा, जिसके चलते आज उनका पुत्र देश की सीमाओं पर दुश्मनों से लोहा लेकर देश की रक्षा में जुटा है। उन्होंने बताया कि 1980 वो भारत आए, जिसके बाद 1983 में वह नागा रेजिमेंट में भर्ती हुए।
बलिदानी हरीश देवड़ी के गांव को अब भी सड़क का इंतजार
अल्मोड़ा: भैंसियाछाना ब्लाक के देवड़ा गांव निवासी लास नायक हरीश सिंह देवड़ी ने भी देश की रक्षा करते हुए कारगिल युद्ध में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनका परिवार अब अल्मोड़ा के खोल्टा में रहता है। उनकी पत्नी सावित्री दवेड़ी ने बताया कि उनके गांव के लिए बलिदान के नाम पर सड़क बननी थी, अब तक करीब तीन किमी सड़क नहीं बनी है। हालांकि बीच में संबंधित विभागों की ओर से सर्वे किया गया था। वहीं सावित्री ने बताया कि पति हरीश देवड़ी का बलिदान हमेशा प्रेरणा देता है।
आज शौर्य दिवस के रूप सम्मान से मनाया जाएगा
जिला सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास अधिकारी कर्नल विजय मनराल (सेनि) ने बताया कि आज रविवार को कारगिल दिवस को शौर्य दिवस के रूप में पूरी श्रद्धा एवं सम्मान के साथ मनाया जाएगा। उन्होंने बताया कि सुबह 10:15 बजे शहीद स्मारक छावनी क्षेत्र, अल्मोड़ा में कारगिल बलिदानियों को पुष्प-चक्र एवं श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। उन्होंने इस अवसर पर जनपद के समस्त गणमान्य व्यक्तियों, पूर्व सैनिकों, वीरांगनाओं को कारगिल बलिदानियों को श्रद्धा-सुमन एवं पुष्प-चक्र अर्पित करने के लिए आमंत्रित किया है।