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    मई के अंतिम दिन बागेश्वर के सोराग में अप्रत्याशित हिमपात, जलवायु परिवर्तन की चिंताएं बढ़ीं

    Updated: Sun, 31 May 2026 05:23 PM (IST)

    मई के अंत में कपकोट के सोराग क्षेत्र की ऊंची पहाड़ियों पर हुए हिमपात ने स्थानीय लोगों को हैरान कर दिया है। इससे ठंड बढ़ गई है। ...और पढ़ें

    बागेश्वर के कपकोट तहसील का सोराग गांव की पहाड़ियों में हिमपात। सौ. दीवान सिंह दानू।

    बागेश्वर के कपकोट तहसील का सोराग गांव की पहाड़ियों में हिमपात। सौ. दीवान सिंह दानू।

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    जागरण संवाददाता, बागेश्वर। मई के अंतिम दिन और जून की शुरुआत से ठीक पहले कपकोट तहसील के सोराग क्षेत्र के सामने स्थित ऊंची पहाड़ियों पर हुए हिमपात ने स्थानीय लोगों को हैरानी में डाल दिया है।

    आमतौर पर इस समय तक बुग्यालों और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में चरवाहों की गतिविधियां बढ़ जाती हैं, लेकिन इस बार मौसम ने अप्रत्याशित करवट लेते हुए पहाड़ियों को बर्फ की सफेद चादर से ढक दिया है।

    हिमपात के बाद क्षेत्र में ठंड का असर बढ़ गया है। हिमालयी गांवों में एक बार फिर शीतलहर जैसे हालात बन गए हैं। लोगों ने गर्म कपड़े निकाल लिए हैं और ठंड से बचने के लिए घरों में अलाव जलाने शुरू कर दिए हैं।

    वहीं बुग्यालों की ओर गए भेड़-बकरी पालक भी निचले क्षेत्रों की ओर लौटने लगे हैं। स्थानीय निवासी दीवान सिंह दानू ने बताया कि उनकी उम्र 60 वर्ष हो चुकी है, लेकिन उन्होंने मई के अंत अथवा जून की शुरुआत में इस तरह का हिमपात पहली बार देखा है।

    उन्होंने कहा कि जिन पहाड़ियों की तलहटी में इस समय भेड़-बकरियां चरने जाती थीं, वहां बर्फबारी होना मौसम में बड़े बदलाव का संकेत है।

    जलवायु परिवर्तन के संकेतों पर बढ़ी चिंता

    पिछले कुछ वर्षों में हिमालयी क्षेत्रों में मौसम के पैटर्न में लगातार बदलाव देखने को मिल रहे हैं। कहीं असमय बारिश, कहीं ओलावृष्टि तो कहीं गर्मियों में हिमपात जैसी घटनाएं बढ़ी हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे घटनाक्रम हिमालयी पारिस्थितिकी, कृषि, पशुपालन और जल स्रोतों पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकते हैं।

    पर्यावरणविद किशन सिंह मलड़ा का मानना है कि मई के अंतिम दिनों में हिमपात जैसी घटनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाना चाहिए, ताकि यह समझा जा सके कि यह एक अस्थायी मौसमीय घटना है या हिमालयी क्षेत्र में बदलते जलवायु चक्र का संकेत।

    विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में ऐसे परिवर्तनों की लगातार निगरानी और अध्ययन समय की आवश्यकता है।

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