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    कार्बेट में हाथियों को जंगल में ही रोकेंगी मधुमक्खियां, अब नए कलेवर के साथ प्रारंभ होने जा रही मौनपालन योजना

    Updated: Sun, 01 Feb 2026 06:35 AM (IST)

    कार्बेट टाइगर रिजर्व में हाथियों को गांवों में आने से रोकने के लिए नई मौनपालन योजना शुरू हो रही है। मधुमक्खियां हाथियों को जंगल में ही रोकेंगी, जिससे ...और पढ़ें

    कार्बेट टाइगर रिजर्व में मौनपालन के लिए इस तरह से वन सीमा पर रखे गए थे मौनबाक्स। साभार सीटीआर

    कार्बेट टाइगर रिजर्व में मौनपालन के लिए इस तरह से वन सीमा पर रखे गए थे मौनबाक्स। साभार सीटीआर

    HighLights

    1. मधुमक्खियां हाथियों को जंगल में ही रोककर सुरक्षा देंगी।

    2. मौनपालन योजना से स्थानीय ईडीसी की आर्थिक समृद्धि बढ़ेगी।

    3. मानव-वन्यजीव संघर्ष को सह-अस्तित्व में बदलने में सहायक।

    केदार दत्त, जागरण, देहरादून। जब गजराज के कदमों की गूंज गांवों में दहशत का पर्याय बन जाए, तब समाधान अक्सर प्रकृति की छोटी रचनाओं में ही छिपा होता है।

    कार्बेट टाइगर रिजर्व से लगे आबादी वाले क्षेत्रों में नए कलेवर के साथ प्रारंभ की जा रही मौनपालन योजना की ऐसी ही पहल एक तीर से दो निशाने साधने जैसी है।

    मधुमक्खियां जहां हाथियों को जंगल में ही रोके रखकर सुरक्षा ढाल बनेंगी, वहीं शहद की मिठास स्थानीय ईको विकास समितियों (ईडीसी) की आर्थिक समृद्धि के द्वार भी खोलेगी। यही नहीं, मानव-वन्यजीव संघर्ष को सह-अस्तित्व में बदलने में यह पहल बेहद मददगार साबित होगी।

    सुनने में थोड़ा अजीब लगता है कि विश्व का सबसे बड़ा थलचर जीव हाथी एक नन्हीं सी मधुमक्खी से डरता है, लेकिन यह बात सही है। विशेषज्ञों के मुताबिक मधुमक्खियों की भिनभिनाहट हाथियों को परेशान करती है।

    साथ ही हाथी के शरीर के उन हिस्सों विशेषकर कान के पीछे, आंख के पास, सूंड के निचले हिस्से में डंक मारती है, जहां त्वचा अपेक्षाकृत पतली होती है। वैसे भी मधुमक्खियां झुंड में हमला करती हैं।

    ऐसे में हाथी उनके पास से हटना ही मुनासिब समझते हैं। इसे देखते हुए कार्बेट टाइगर रिजर्व से लगे आबादी वाले क्षेत्रों में हाथी की धमक को रोकने के उद्देश्य से वर्ष 2022 में वहां वन सीमा पर मौनपालन का निर्णय लिया गया।

    गांवों में गठित ईडीसी को यह कार्य दिया गया और इसके लिए प्रारंभिक चरण में आठ ईडीसी चयनित की गईं। इन समितियों के माध्यम से वन सीमा पर मधुमक्खियों के बक्सों की एक तरह से जैविक बाड़ तैयार की गई।

    इसका लाभ भी मिला और हाथियों की खेतों व आबादी की ओर आना कम हो गया। साथ ही कार्बेट हनी के नाम से ईडीसी शहद भी बिक्री करने लगीं। लेकिन, तकनीकी प्रशिक्षण के अभाव, मौन बाक्स की शिफ्टिंग समेत अन्य कारणों से यह योजना कुछ समय बाद लगभग बंद सी हो गई।

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    अब नए कलेवर के साथ होगी शुरू

    कार्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डा साकेत बडोला के अनुसार कार्बेट की सीमा पर मौनपालन की योजना को नए स्वरूप व नए कलेवर के साथ जल्द ही शुरू किया जाएगा। इस कड़ी में एक एजेंसी से टाइअप किया जा रहा है।

    यह एजेंसी ईडीसी के सदस्यों को तकनीकी प्रशिक्षण देगी। साथ ही मधुमक्खियों को बीमारी से बचाने, मौनपालन के लिए धन देने के साथ ही वह ईडीसी से शहद भी खरीदेगी। साथ ही प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करेगी।

    पहले चरण के लिए तीन क्षेत्र चयनित

    डा. बडोला ने बताया कि योजना के लिए प्रथम चरण में कार्बेट से लगे ढेला, सावल्दे व तराई पश्चिमी क्षेत्र की सीमा को चयनित किया गया है। इसके बाद रिजर्व की उत्तरी सीमा पर इसे शुरू किया जाएगा।

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